सुनील आंबेकर ने अपने संबोधन में कहा कि विभाजन का वह दौर भारतीय इतिहास का अत्यंत संवेदनशील और दर्दनाक अध्याय रहा है, जिसे राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से हमेशा गहरी पीड़ा के साथ याद किया जाता है। उन्होंने कहा कि उस समय संगठन का विस्तार दिल्ली और अविभाजित पंजाब जैसे क्षेत्रों में तेजी से हो रहा था, लेकिन उसकी संगठनात्मक क्षमता अभी सीमित थी। उनके अनुसार, यदि उस समय संगठन और अधिक सशक्त होता, तो परिस्थितियां कुछ और दिशा ले सकती थीं और विभाजन को रोका जा सकता था।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विभाजन के दौरान संगठन से जुड़े स्वयंसेवकों ने उन क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा और सहायता के लिए काम किया, जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बने। उन्होंने दावा किया कि स्वयंसेवक तब तक सक्रिय रहे जब तक प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया नहीं गया। इस दौरान राहत शिविरों के संचालन और विस्थापित लोगों की सहायता में भी योगदान का उल्लेख किया गया।
अपने संबोधन में सुनील आंबेकर ने यह भी कहा कि संगठन की स्थापना के.बी. हेडगेवार ने किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि समाज में सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए की थी। उन्होंने यह भी कहा कि संगठन का उद्देश्य समाज को संगठित करना था, न कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना।
इस बयान के बाद ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है, जिसमें अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का विभाजन एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसमें कई राजनीतिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय कारण शामिल थे, जिन्हें केवल एक कारक से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यह मुद्दा अब एक बार फिर इतिहास, राजनीति और विचारधारा के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है, जहां विभिन्न समूह अपने-अपने दृष्टिकोण से उस दौर की घटनाओं को समझने और व्याख्यायित करने की कोशिश कर रहे हैं।