इस खौफनाक दास्तां की शुरुआत 1 अक्टूबर 2016 को हुई, जब आश्रम से 15 और 16 साल की दो लड़कियां लापता हो गईं। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें अशोकनगर से बरामद तो कर लिया, लेकिन उनके चेहरों पर पसरा डर किसी बड़ी अनहोनी की गवाही दे रहा था। बाल कल्याण समिति (CWC) की देखरेख में जब इन बच्चियों की काउंसलिंग हुई, तो जो सच बाहर आया उसने प्रशासन के पैरों तले जमीन खिसका दी। बच्चियों ने बताया कि रात के खाने में उन्हें नशीला पदार्थ दिया जाता था, जिसके बाद उनके साथ हैवानियत होती थी। सुबह जब वे जागती थीं, तो उनके शरीर में दर्द और रक्तस्राव के निशान होते थे, लेकिन बेहोशी के कारण उन्हें कुछ स्पष्ट याद नहीं रहता था।
जांच के घेरे में सबसे पहले आश्रम की डायरेक्टर शैला अग्रवाल आईं। जब पुलिस ने अन्य बच्चियों की काउंसलिंग की कोशिश की, तो शैला ने बहाने बनाकर उन्हें रोकने का प्रयास किया। इस संदिग्ध व्यवहार ने पुलिस के शक को यकीन में बदल दिया। आश्रम में छापेमारी के दौरान CWC के शिकायत बॉक्स ने जुल्म की परतों को खोलना शुरू किया। ग्वालियर से आई काउंसलर्स की टीम के सामने 10 से 17 साल की 6 बच्चियों ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि आश्रम में रहने वाले 77 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर के.एन. अग्रवाल, जिन्हें वे ‘बाबा’ कहती थीं, उनके साथ दुष्कर्म और अश्लील हरकतें करते थे।
बच्चियों के बयानों में एक और नाम प्रमुखता से उभरा—’बुआ’ यानी शैला अग्रवाल। बच्चियां शैला से इस कदर डरी हुई थीं कि उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने कुछ भी कहा तो शैला उन्हें जान से मार देगी। मेडिकल रिपोर्ट ने भी बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म की पुष्टि कर दी। इसके बाद 17 नवंबर 2016 को पुलिस ने के.एन. अग्रवाल और उनकी बेटी शैला अग्रवाल के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और दुष्कर्म की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया। गिरफ्तारी के डर से आरोपी प्रोफेसर फरार हो गया था, जिसे बाद में पुलिस की तीन टीमों ने कड़ी मशक्कत के बाद गिरफ्तार किया।
कानूनी लड़ाई करीब डेढ़ साल तक चली। 7 मई 2018 को शिवपुरी की विशेष अदालत ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने 77 वर्षीय के.एन. अग्रवाल को अनाथ बच्चियों के साथ दुष्कर्म, मारपीट और धमकाने का दोषी पाया। वहीं, उनकी बेटी शैला अग्रवाल को इस घिनौने अपराध में बराबर का भागीदार मानते हुए दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि, सबूतों के अभाव में एक अन्य आरोपी क्लर्क को बरी कर दिया गया।
इस मामले में नया मोड़ जनवरी 2024 में आया। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर अपील पर सुनवाई करते हुए अदालत ने के.एन. अग्रवाल की बढ़ती उम्र और लगभग 7 साल जेल में बिताने के आधार पर उनकी सजा को अंतिम फैसले तक निलंबित कर दिया। फिलहाल पिता-पुत्री दोनों जमानत पर बाहर हैं, लेकिन हाईकोर्ट में उनकी याचिका पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है। यह मामला आज भी मध्य प्रदेश के सबसे चर्चित और संवेदनशील क्राइम फाइल्स में गिना जाता है, जो समाज में मौजूद सफेदपोश अपराधियों के असली चेहरे को उजागर करता है।