सांसद रो खन्ना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि जब वे खंडहरों का दौरा कर रहे थे, तभी अमेरिकी निर्मित एम4एस राइफलों से लैस इजरायली बस्ती के कुछ लोगों ने उन्हें और उनके पूरे प्रतिनिधिमंडल को जबरन हिरासत में ले लिया। खन्ना का आरोप है कि घटना की सूचना मिलने के बाद जब इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) के जवान मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने हथियारबंद हमलावरों को रोकने के बजाय उल्टा उनका ही साथ दिया और अमेरिकी नागरिकों को आगे बढ़ने से रोके रखा। अमेरिकी डेलिगेशन के साथ मौजूद सुरक्षा अधिकारियों और इजरायली बलों के बीच इस दौरान तीखी बहस भी हुई।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के एक अमेरिकी फोटोग्राफर भी सांसद खन्ना के साथ मौजूद थे, जिन्होंने इस तनावपूर्ण स्थिति को करीब से देखा। अमेरिकी मीडिया से बातचीत करते हुए रो खन्ना ने अपना दर्द बयां किया और कहा कि उस असाधारण परिस्थिति में उन्होंने खुद को पूरी तरह से असहाय महसूस किया। उन्होंने कहा कि उनके पास जीवन के तमाम विशेषाधिकार और उच्च सुरक्षा कवच होने के बावजूद उन्हें इस खौफनाक दौर से गुजरना पड़ा, जिससे वहां के सामान्य नागरिकों की दैनिक सुरक्षा व्यवस्था और जमीनी हकीकत का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
घटना के तुरंत बाद अमेरिकी राजनयिकों को इसकी जानकारी दी गई, जिसके बाद वॉशिंगटन से लेकर यरूशलेम तक कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। अमेरिकी दूतावास और इजरायली पुलिस के उच्च अधिकारियों के बीच हुए कड़े कूटनीतिक हस्तक्षेप और लंबी बातचीत के बाद आखिरकार लगभग डेढ़ घंटे के बाद रो खन्ना और उनके सहयोगियों को सुरक्षित वहां से जाने की अनुमति दी गई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस घटना को बेहद गंभीरता से लिया है और इसे अमेरिकी जनप्रतिनिधि के साथ एक अक्षम्य दुर्व्यवहार माना जा रहा है।
इस घटना के बाद वैश्विक स्तर पर इजरायली बस्तियों में सक्रिय हथियारबंद गुटों की भूमिका और वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। रो खन्ना ने अपने बयान में जोर देते हुए कहा कि यदि अमेरिकी संसद के किसी शक्तिशाली सदस्य को इस प्रकार 90 मिनट तक बंधक बनाकर बेबस किया जा सकता है, तो कब्जे के साये में रह रहे आम फिलिस्तीनी नागरिकों को हर दिन न जाने किस स्तर के उत्पीड़न और असुरक्षा का सामना करना पड़ता होगा। इस घटना ने पश्चिम एशिया के इस संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा और मानवाधिकारों की स्थिति को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।