न्यायमूर्ति सैकिया ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुबंध है जो देश को एकता और न्याय के सूत्र में बांधता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे अपने ज्ञान को केवल पुस्तकीय सीमाओं तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समाज के वास्तविक जीवन से जोड़कर आगे बढ़ाएं। उनके अनुसार, संवैधानिक मूल्यों और स्थानीय ज्ञान के आधार पर किया गया नवाचार ही एक मजबूत और समावेशी समाज की नींव रख सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित यह संस्थान शिक्षा और समाज के बीच सेतु का काम कर रहा है और इसका ऐतिहासिक महत्व काफी व्यापक है। उनके अनुसार, ऐसे शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा प्रदान करने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक सोच और विकास की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समारोह में उपस्थित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भी शिक्षा को समाज और समुदायों से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब वह वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान में उपयोगी साबित हो। इस अवसर पर यह भी बताया गया कि इस वर्ष कई विद्यार्थियों को शोध और स्नातक उपाधियाँ प्रदान की गईं, साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्रों को सम्मानित भी किया गया।