सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच बेहद आवश्यक है। न्यायालय ने दोनों पक्षों से मीडिया में बयानबाजी बंद करने की अपील करते हुए कहा कि किसी भी तरह की सार्वजनिक टिप्पणी जांच की दिशा और निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। अदालत का मानना था कि जब जांच प्रक्रिया चल रही हो तब हर संबंधित पक्ष को संयम और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। इससे न केवल जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलता है बल्कि सत्य तक पहुंचने की प्रक्रिया भी मजबूत होती है।
मामले के दौरान न्यायपालिका को लेकर फैल रही विभिन्न चर्चाओं और अटकलों पर भी अदालत ने नाराजगी व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि बिना किसी आधार के ऐसी बातें फैलाना कि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, बेहद गंभीर विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष में कोई राय व्यक्त नहीं की गई है और पूरे मामले को निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। न्यायपालिका का उद्देश्य केवल सत्य और न्याय सुनिश्चित करना होता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया पर बढ़ती अटकलों के प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी और अपुष्ट जानकारियां कई बार वास्तविक जांच को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि तथ्यों के सामने आने तक धैर्य और जिम्मेदारी बनाए रखी जाए।
फिलहाल सभी की नजरें आगे की जांच प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। उम्मीद की जा रही है कि निष्पक्ष जांच के माध्यम से पूरे मामले की सच्चाई सामने आएगी और जो भी तथ्य सामने होंगे, उन्हीं के आधार पर न्याय की दिशा तय होगी। ऐसे संवेदनशील मामलों में संयम, धैर्य और न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।