नई दिल्ली । पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रियाओं का पालन किया जाना आवश्यक है। अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि कथित टिप्पणियां सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती हैं। इस आधार पर मामले में शीघ्र सुनवाई की मांग की गई। हालांकि अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि ऐसे मामलों के लिए पहले से निर्धारित कानूनी तंत्र मौजूद है, जिसका उपयोग किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह जानना चाहा कि क्या मामले में संबंधित एजेंसियों या पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई है। अदालत ने कहा कि देश में कानून लागू करने वाली संस्थाएं मौजूद हैं और उन पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति या संस्था ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका सीधे हर शिकायत की प्रारंभिक जांच करने की नहीं है। शीर्ष न्यायालय का दायित्व व्यापक संवैधानिक और कानूनी निगरानी सुनिश्चित करना है। यदि प्रत्येक मामला सीधे सर्वोच्च अदालत में लाया जाएगा तो निचली अदालतों और अन्य सक्षम संस्थाओं की भूमिका प्रभावित होगी, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि कानून के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों का उपयोग किए जाने के बाद भी यदि संबंधित प्राधिकरण उचित कार्रवाई नहीं करते हैं, तब न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की जा सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि न्याय व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर स्थापित संस्थाओं को पहले अपना कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सद्भाव से जुड़े मामले संवेदनशील प्रकृति के होते हैं। ऐसे मामलों में सभी पक्षों को जिम्मेदारी और संयम के साथ व्यवहार करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि संवेदनशील विषयों पर अनावश्यक विवाद या सनसनी फैलाने से बचना आवश्यक है, क्योंकि इससे सामाजिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
अदालत ने दोहराया कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन किया गया है तो उसके खिलाफ कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायतों के निपटारे के लिए स्थापित संस्थागत व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस घटनाक्रम के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि शीर्ष अदालत ऐसे मामलों में पहले वैधानिक प्रक्रिया अपनाने को प्राथमिकता देती है। न्यायालय का संदेश यह रहा कि कानून के दायरे में उपलब्ध सभी उपायों का उपयोग करने के बाद ही किसी मामले को सर्वोच्च न्यायिक मंच तक ले जाना उचित माना जाएगा।