Mahakaushal Times

होयसल राजवंश कालीन 1000 वर्ष पुराने मंदिर का रहस्य विज्ञान के लिए भी पहेली, दीपावली पर कपाट खुलने के बाद उमड़ती है लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़

नई दिल्ली । भारत के प्राचीन और ऐतिहासिक देवस्थलों में छिपे रहस्य अक्सर आधुनिक विज्ञान और पुरातत्वविदों को हैरत में डाल देते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और बेहद रहस्यमयी मामला दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से सामने आया है, जहां हासन शहर में स्थित करीब 1000 साल पुराना ‘हसनंबा मंदिर’ अपने अनोखे चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में कौतूहल का विषय बना हुआ है। यह मंदिर आम धार्मिक स्थलों की तरह प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए नहीं खुलता है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे वर्ष में केवल एक बार, दीपावली के पावन त्योहार के दौरान मात्र 10 से 12 दिनों के लिए ही खोला जाता है। शेष पूरे वर्ष इस मंदिर के भारी कपाट पूरी तरह से बंद और सील रहते हैं।

इस प्राचीन मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली है और इसका सीधा संबंध ऐतिहासिक होयसल राजवंश से जुड़ता है। मशहूर ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ-साथ मैसूर गजेटियर जैसी प्रामाणिक सरकारी किताबों में इस मंदिर के महात्म्य और राजाओं की अगाध श्रद्धा का विस्तृत विवरण मिलता है। होयसल शासकों के काल में निर्मित इस मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और स्थापत्य शैली को देखकर आज भी पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। प्रामाणिक ऐतिहासिक कड़ियों और सरकारी गजेटियर में दर्ज होने के कारण इस मंदिर की साख और इसका ऐतिहासिक महत्व शोधकर्ताओं के बीच और अधिक बढ़ जाता है।

मंदिर से जुड़ा सबसे बड़ा वैज्ञानिक सस्पेंस इसके गर्भगृह के भीतर घटित होने वाली वह घटना है, जो भौतिक विज्ञान के नियमों को सीधी चुनौती देती नजर आती है। दीपावली के उत्सव की समाप्ति के बाद जब इस मंदिर को आगामी एक वर्ष के लिए बंद किया जाता है, तब मुख्य पुजारी द्वारा गर्भगृह के भीतर एक विशेष अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। मंदिर को अंतिम रूप से बंद करने से ठीक पहले माता हसनंबा की दिव्य मूर्ति के समक्ष घी का एक दीया प्रज्वलित करके रख दिया जाता है। इसके साथ ही देवी मां को ताजे पके हुए चावलों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है और कुछ बेहद सुंदर ताजे फूल भी चरणों में चढ़ाए जाते हैं।

इन सभी सामग्रियों को गर्भगृह के भीतर यथास्थान सजाकर मंदिर के मुख्य विशाल द्वारों को बंद कर दिया जाता है और प्रशासन व पुजारियों की मौजूदगी में उन्हें पूरी तरह सील कर दिया जाता है। इसके बाद ठीक एक साल बाद जब अगले वर्ष दीपावली के तय समय पर इस मंदिर को दोबारा खोला जाता है, तो भीतर का नजारा पुजारियों और वहां मौजूद अधिकारियों को स्तब्ध कर देता है। जब सील तोड़कर गर्भगृह का भारी दरवाजा खोला जाता है, तो वह दीया बिना किसी अतिरिक्त ईंधन या मानवीय सहायता के ठीक उसी प्रकार जलता हुआ प्राप्त होता है, जैसा उसे एक वर्ष पूर्व छोड़ कर जाया गया था।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि मां को चढ़ाया गया पके हुए चावल का प्रसाद भीषण गर्मी और मौसम के बदलावों के बाद भी एक साल तक बिल्कुल ताजा बना रहता है। इस भोजन में से न तो किसी प्रकार की दुर्गंध आती है और न ही यह दूषित होता है। यही नहीं, माता के चरणों में अर्पित किए गए फूल भी एक वर्ष तक बिना पानी और हवा के वैसे ही खिले, महकते और ताजे दिखाई देते हैं। स्थानीय समाज और देश भर से आने वाले श्रद्धालु इसे हसनंबा देवी का साक्षात दिव्य चमत्कार मानते हैं। यही कारण है कि वर्ष के उन चुनिंदा 10-12 दिनों में इस अलौकिक दृश्य और माता के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

MADHYA PRADESH WEATHER

आपके शहर की तथ्यपूर्ण खबरें अब आपके मोबाइल पर