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चित्रकूट में पारंपरिक खजूर झाड़ू उद्योग संकट में, प्लास्टिक झाड़ुओं ने छीनी कारीगरों की आजीविका



नई दिल्ली। चित्रकूट जिले में खजूर के पत्तों से बनने वाली पारंपरिक झाड़ू का रोजगार तेजी से खत्म होता जा रहा है, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर संकट गहरा गया है। कभी यह काम गांव-गांव में स्थायी आमदनी का साधन था, लेकिन अब प्लास्टिक और फैशनेबल झाड़ुओं की बढ़ती मांग ने इस घरेलू उद्योग को लगभग कमजोर कर दिया है।

पाठा क्षेत्र सहित कई गांवों में 100 से ज्यादा परिवार पीढ़ियों से खजूर की झाड़ू बनाकर जीवन यापन करते थे, लेकिन अब बाजार में इसकी मांग काफी कम हो गई है। पहले जहां यह झाड़ू बेहद सस्ते दाम पर बिकती थी, वहीं अब लागत बढ़ने के बावजूद बिक्री घटने से कारीगर परेशान हैं।

कारीगरों का कहना है कि पहले खजूर के पत्ते आसानी से मिल जाते थे और झाड़ू बनाने का खर्च भी कम था, लेकिन अब कच्चे माल की कीमत बढ़ने से मुनाफा लगभग खत्म हो गया है। एक झाड़ू तैयार करने में कई दिन लगते हैं, लेकिन फिर भी उचित दाम नहीं मिल पा रहा है।

स्थानीय कारीगरों और महिलाओं ने बताया कि प्लास्टिक झाड़ुओं की बढ़ती मांग ने उनके पारंपरिक काम को लगभग खत्म कर दिया है। इससे कई परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं और रोजगार का यह पुराना जरिया धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।

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