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पर्यावरण संरक्षण से ही होगा अपना रक्षण


डा. विनोद बब्बर

पर्यावरण केवल हमारे आसपास मौजूद पेड़ पौधों नदियों पहाड़ों और जीव जंतुओं का समूह नहीं है बल्कि यही पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व की सबसे मजबूत नींव है। स्वच्छ हवा निर्मल जल उपजाऊ मिट्टी और संतुलित जलवायु ही स्वस्थ जीवन का आधार बनते हैं। लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का जिस तेजी से दोहन किया जा रहा है उसने पूरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां अब चेतने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन नहीं बनाया गया तो आने वाली पीढ़ियों को जल संकट भीषण गर्मी प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने जलवायु परिवर्तन के खतरनाक संकेत साफ तौर पर देखे हैं। कहीं असामान्य बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। जंगलों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। इन सभी घटनाओं का सीधा संबंध पर्यावरण असंतुलन से है। बढ़ती आबादी शहरीकरण औद्योगीकरण और अंधाधुंध पेड़ों की कटाई ने प्रकृति की स्वाभाविक व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसका असर केवल मौसम पर ही नहीं बल्कि खेती पेयजल जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है।

भारत जैसे देश में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता और भी अधिक है क्योंकि यहां बड़ी आबादी सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। जल स्रोतों का संरक्षण वर्षा जल संचयन अधिक से अधिक वृक्षारोपण और प्लास्टिक के उपयोग में कमी जैसे छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने स्तर पर जल और ऊर्जा की बचत करे पौधारोपण को जीवन का हिस्सा बनाए और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से दूरी बनाए तो देश में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

सरकारें समय समय पर पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक योजनाएं और अभियान चलाती हैं लेकिन इन अभियानों की वास्तविक सफलता तभी संभव है जब समाज उनकी जिम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी समझे। केवल कानून बनाकर या सरकारी प्रयासों से प्रकृति को नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए हर परिवार हर विद्यालय हर संस्था और हर नागरिक की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। बच्चों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति प्रेम और संरक्षण की भावना विकसित करना भी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। यदि हमने आज प्रकृति की रक्षा की तो वही प्रकृति भविष्य में हमारी रक्षा करेगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं बल्कि मानव अस्तित्व को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। यही समय है जब हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह प्रकृति को बचाने में अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाएगा क्योंकि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तभी हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों सुरक्षित रहेंगे।

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