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AI के दौर में इंसान की असली ताकत क्या? न्यूरोसाइंटिस्ट हन्ना ने बताया सफलता का नया फॉर्मूला




नई दिल्ली। एआई और मशीनों के तेजी से विकसित होते दौर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इंसान खुद को भविष्य में कैसे प्रासंगिक बनाए रखेगा? जब मशीनें लेखन, कोडिंग और डेटा विश्लेषण जैसे काम तेजी से करने लगी हैं, तब इंसानी दिमाग की असली ताकत क्या होगी? इसी सवाल का जवाब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की न्यूरोसाइंटिस्ट Hannah Critchlow ने अपनी नई किताब The 21st Century Brain में दिया है।

डॉ. हन्ना के मुताबिक आने वाले समय में सिर्फ तेज दिमाग या हाई IQ ही सफलता तय नहीं करेगा, बल्कि वही लोग आगे बढ़ेंगे जो भावनाओं को समझना जानते हों, बदलाव और अनिश्चितता से डरते न हों और जिनकी कल्पनाशक्ति मजबूत हो। डॉ. हन्ना के मुताबिक आने वाले समय में सिर्फ तेज दिमाग या हाई IQ ही सफलता तय नहीं करेगा, बल्कि वही लोग आगे बढ़ेंगे जो भावनाओं को समझना जानते हों, बदलाव और अनिश्चितता से डरते न हों और जिनकी कल्पनाशक्ति मजबूत हो। उनका कहना है कि तकनीक के इस युग में इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहानुभूति, भावनात्मक समझ और रचनात्मक सोच होगी।

हन्ना बताती हैं कि पिछले हजारों वर्षों में इंसानी दिमाग का आकार थोड़ा छोटा जरूर हुआ है, लेकिन नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और नई सोच पैदा करने की क्षमता पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। उनका मानना है कि यही लचीलापन इंसानों को मशीनों से अलग बनाता है।

डॉ. हन्ना के अनुसार एआई का विकास भी न्यूरोसाइंस के सिद्धांतों पर आधारित है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि इंसान अपने दिमाग की उन खूबियों को फिर से मजबूत करे जिन्हें लंबे समय तक “सॉफ्ट स्किल्स” कहकर नजरअंदाज किया गया। इनमें भावनात्मक संतुलन, टीमवर्क, रिश्तों को समझने की क्षमता और कल्पनाशील सोच शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि महान वैज्ञानिक Thomas Edison भी रचनात्मक सोच के लिए खास तरीके अपनाते थे। एडिसन झपकी लेते समय हाथ में धातु की वस्तु रखते थे ताकि नींद लगते ही वस्तु गिरने की आवाज से उनकी आंख खुल जाए और वे अवचेतन में आए नए विचारों को तुरंत लिख सकें।

डॉ. हन्ना दिमाग को तेज और लचीला बनाए रखने के लिए अच्छी नींद, संतुलित खान-पान, नियमित व्यायाम और प्रकृति के बीच समय बिताने को बेहद जरूरी मानती हैं। उनके मुताबिक आंत यानी गट में मौजूद बैक्टीरिया भी ऐसे रसायन बनाते हैं जो दिमाग तक संदेश पहुंचाने में मदद करते हैं और इंसान के व्यवहार व सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं।

रचनात्मकता बढ़ाने को लेकर उनकी सबसे दिलचस्प सलाह है कि इंसान को अपने दिमाग को कभी-कभी “भटकने” देना चाहिए। यानी डेड्रीमिंग और माइंड-वांडरिंग को पूरी तरह बेकार नहीं समझना चाहिए। उनका कहना है कि दिमाग का यही भटकाव नए और क्रांतिकारी विचारों को जन्म देता है। प्रकृति के बीच टहलने से दिमाग में अल्फा वेव्स बढ़ती हैं, जो मन को शांत और अधिक रचनात्मक बनाती हैं।

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