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मोहम्मद रफी ने अपने बच्चों को क्यों रखा सिंगिंग से दूर? दिग्गज गायक की सोच जानकर रह जाएंगे हैरान

नई दिल्ली । भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में जब भी महान गायकों का जिक्र होगा, मोहम्मद रफी का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। अपनी मधुर आवाज और बहुमुखी गायन शैली से उन्होंने दशकों तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया। रोमांटिक गीत हों, दर्द भरे नगमे हों या फिर देशभक्ति के गीत, रफी साहब ने हर अंदाज में अपनी अमिट छाप छोड़ी। लेकिन उनके जीवन से जुड़ा एक सवाल हमेशा लोगों के मन में उठता रहा है कि आखिर उनके बच्चों ने गायकी को अपना करियर क्यों नहीं बनाया।

मोहम्मद रफी के कुल सात बच्चे थे। उनकी पहली शादी बशीरा से हुई थी, जिनसे उनका एक बेटा सईद हुआ। बाद में उन्होंने बिलकिस बानो से निकाह किया, जिनसे उनके तीन बेटे और तीन बेटियां हुईं। इतने बड़े संगीत परिवार से होने के बावजूद उनके किसी भी बच्चे ने प्रोफेशनल सिंगिंग की दुनिया में कदम नहीं रखा। इसके पीछे की वजह खुद रफी साहब की सोच थी।

मोहम्मद रफी पर लिखी गई किताब ‘मोहम्मद रफी: माय अब्बा’ में उनकी बहू यास्मीन खालिद ने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है। उनके अनुसार रफी साहब कभी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे केवल उनके नाम और विरासत के सहारे संगीत जगत में उतरें। उनका मानना था कि जिस मुकाम तक वह अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर पहुंचे थे, वहां तक पहुंचना आसान नहीं है। उन्हें डर था कि उनके बच्चों की तुलना हमेशा उनसे की जाएगी और यह दबाव उनके लिए बोझ बन सकता है।

यास्मीन के मुताबिक, रफी साहब ने अपने बच्चों को शुरू से ही एक सामान्य जीवन देने की कोशिश की। उन्होंने उन्हें बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ाया और संगीत की दुनिया की चमक-दमक से दूर रखा। वह चाहते थे कि उनके बच्चे अपनी पसंद और योग्यता के अनुसार जीवन में आगे बढ़ें, न कि पिता की पहचान के दबाव में कोई रास्ता चुनें।

रफी साहब की सादगी भी उतनी ही मशहूर थी जितनी उनकी गायकी। बताया जाता है कि वह रोज सुबह पांच बजे उठते थे और नियमित रूप से रियाज करते थे। उन्हें साधारण जीवन पसंद था और वह घर का बना खाना ही खाना पसंद करते थे। मीडिया से दूरी बनाए रखना भी उनकी आदतों में शामिल था। उनका मानना था कि वह एक आम इंसान हैं और उनके पास बताने के लिए कोई सनसनीखेज कहानी नहीं है।

संगीत के इस महान सितारे का जीवन भले ही बेहद सफल रहा, लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन विनम्रता और अनुशासन से भरा हुआ था। यही कारण था कि उन्होंने अपने बच्चों पर कभी अपनी पहचान का बोझ नहीं डाला। उन्होंने उन्हें स्वतंत्र रूप से जीवन जीने और अपनी राह चुनने की आजादी दी।

31 जुलाई 1980 को मात्र 55 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से मोहम्मद रफी का निधन हो गया था। उनके निधन की खबर ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया था। भारी बारिश के बावजूद हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि रफी साहब केवल एक महान गायक ही नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों की धड़कन थे।

आज भी मोहम्मद रफी के गीत लोगों की जुबान पर हैं और उनकी आवाज संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है। उनके बच्चों ने भले ही गायकी को पेशा नहीं बनाया, लेकिन रफी साहब की विरासत आज भी भारतीय संगीत जगत की सबसे अनमोल धरोहरों में गिनी जाती है।

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