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गांव की संसद क्यों हो रही कमजोर ग्राम सभाओं में घटती भागीदारी ने बढ़ाई चिंता

-ओ.पी. पाल 

भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव गांवों में मानी जाती है और गांवों की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था ग्राम सभा है। संविधान के 73वें संशोधन के जरिए ग्राम सभाओं को अधिकार और संवैधानिक पहचान दी गई ताकि गांव का हर नागरिक विकास योजनाओं से लेकर बजट और स्थानीय फैसलों में अपनी भागीदारी निभा सके। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कई चुनौतियों से घिरती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी लगातार कम हो रही है जिससे जमीनी लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगा है।

इसी स्थिति को समझने के लिए पंचायती राज मंत्रालय के सहयोग से राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान हैदराबाद ने देशभर में व्यापक अध्ययन किया। यह रिपोर्ट 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 213 जिलों की लगभग 400 ग्राम पंचायतों में किए गए सर्वे पर आधारित है जिसमें करीब 7800 लोगों से बातचीत की गई। रिपोर्ट का उद्देश्य यह जानना था कि आखिर ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी क्यों घट रही है और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी समस्या आजीविका और समय का संकट है। बड़ी संख्या में ग्रामीण मजदूरी और खेती पर निर्भर हैं इसलिए वे बैठकों में शामिल नहीं हो पाते। व्यस्त कार्य दिनचर्या खेती के काम और रोजगार की मजबूरी लोगों को ग्राम सभा से दूर कर देती है। इसके अलावा प्रवासी परिवार युवा महिलाएं और बुजुर्ग जैसे वर्ग भी अपेक्षित संख्या में इन बैठकों में शामिल नहीं हो रहे हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि ग्राम सभाओं में होने वाली चर्चाएं कई बार लोगों के जीवन से जुड़ी वास्तविक जरूरतों पर केंद्रित नहीं होतीं। बार बार एक जैसे मुद्दों पर चर्चा होने से लोगों की रुचि कम होती जा रही है। प्रशासन पर भरोसे की कमी राजनीतिक हस्तक्षेप स्थानीय गुटबाजी और शिकायतों के समाधान में देरी भी लोगों को ग्राम सभा से दूर करने वाले प्रमुख कारण हैं।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ग्राम सभाओं को केवल औपचारिक बैठक बनाकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए बल्कि उन्हें स्थानीय विकास का प्रभावी मंच बनाया जाए। महिलाओं के लिए महिला ग्राम सभा और बच्चों तथा युवाओं के लिए अलग विषय आधारित बैठकों का आयोजन किया जाए जिनके सुझाव मुख्य ग्राम सभा में शामिल हों। इसके साथ ही सामाजिक अंकेक्षण यानी सोशल ऑडिट को और मजबूत बनाया जाए ताकि लोग विकास कार्यों की निगरानी में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

पंचायती राज मंत्रालय का मानना है कि ग्रामीण भारत में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार तो हुआ है लेकिन अब जरूरत लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करने की है। यदि ग्राम सभा को पारदर्शी जवाबदेह और जनभागीदारी वाला मंच बनाया जाए तो गांवों के विकास की गति और तेज हो सकती है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता केवल बैठकों में भीड़ जुटाने से नहीं बल्कि लोगों के सुझावों को फैसलों में शामिल करने और उनके भरोसे को मजबूत करने से मिलेगी। यही मजबूत ग्राम सभा भविष्य के सशक्त ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी पहचान बन सकती है।

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