कंपनी ने अपने उत्तरी अमेरिकी स्टोर्स में इन्वेंट्री मैनेजमेंट को आसान और तेज़ बनाने के लिए AI पावर्ड प्रोग्राम शुरू किया था। इसका उद्देश्य स्टोर्स में प्रोडक्ट की कमी जैसी समस्याओं को कम करना और बिक्री को बेहतर बनाना था। इस सिस्टम में कैमरे और अत्याधुनिक LIDAR तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, जिसके जरिए अलमारियों में रखे सामान को ऑटोमेटिक तरीके से स्कैन किया जाता था।
इस तकनीक का मकसद यह था कि कर्मचारियों को हाथ से सामान गिनने की जरूरत न पड़े और पूरी प्रक्रिया तेज़ व अधिक सटीक हो जाए। लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में यह सिस्टम उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। कई मामलों में AI ने प्रोडक्ट्स की गलत गिनती की, कुछ सामानों पर गलत लेबल लगाए और कई बार कुछ चीजों को पूरी तरह पहचान ही नहीं पाया।
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि सिस्टम अलग-अलग प्रकार के दूध के कार्टनों में अंतर करने में भी भ्रमित हो गया। ओट मिल्क, बादाम मिल्क और अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स के बीच सही पहचान करने में AI को कठिनाई हुई, जबकि यह काम सामान्य कर्मचारी कुछ ही सेकंड में आसानी से कर लेते हैं।
इस घटना ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या AI वास्तव में इंसानों की जगह लेने के लिए पूरी तरह तैयार है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा प्रोसेसिंग और ऑटोमेशन में भले ही बेहद प्रभावशाली हो, लेकिन असली दुनिया की छोटी-छोटी बारीकियों को समझना अब भी इसके लिए चुनौती बना हुआ है। पैकेजिंग में मामूली बदलाव, लेबल का रंग या डिजाइन जैसी चीजें कई बार AI सिस्टम को भ्रमित कर देती हैं।
कंपनी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, लगातार आ रही तकनीकी दिक्कतों के बाद अब ऑटोमेटेड काउंटिंग सिस्टम को बंद करने का फैसला लिया गया है। इसके साथ ही स्टोर्स में फिर से पुराने तरीके से इन्वेंट्री की गिनती शुरू कर दी गई है। यानी अब कर्मचारी खुद हाथ से दूध, सिरप और ड्रिंक बनाने के अन्य सामान की जांच करेंगे।
यह मामला केवल एक तकनीकी असफलता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे AI की वास्तविक क्षमता और उसकी सीमाओं को समझने वाले बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में AI को लेकर यह धारणा तेजी से बनी कि यह इंसानी नौकरियों की जगह ले सकता है, लेकिन इस घटना ने यह दिखाया है कि अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां इंसानी अनुभव, समझ और बारीकी से काम करने की क्षमता मशीनों से कहीं आगे है।
फिलहाल यह स्पष्ट हो गया है कि तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, लेकिन हर स्थिति में इंसानी निगरानी और अनुभव की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती।