Bofors Case Final Verdict: 1986 के रक्षा सौदे से शुरू हुआ विवाद आखिर कैसे पहुंचा अपने अंत तक?
1986 के बोफोर्स रक्षा सौदे से शुरू हुआ विवाद अब कानूनी रूप से खत्म हो गया। जानें सुप्रीम कोर्ट के फैसले और पूरे मामले की कहानी।
नई दिल्ली। लगभग 40 वर्षों तक देश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में चर्चा का विषय रहा बोफोर्स घोटाला अब, पूरी तरह ठंडा पड़ गया, कह लीजिए कि विराम लग चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बची आखिरी याचिका भी खारिज कर दी है, और इसके साथ ही 1986 के बोफोर्स तोप खरीद सौदे से जुड़ी सारी कानूनी कागजी कार्रवाई लगभग खत्म हो गई। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में आगे सुनवाई का कोई आधार नहीं बनता
क्या था बोफोर्स घोटाला
बोफोर्स घोटाला की शुरुआत साल 1986 में हुई थी, जब भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से 1,437 करोड़ रुपये में 155 मिमी हॉवित्जर तोपों की खरीद को लेकर समझौता किया। इसके ठीक अगले साल स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट में आरोप लगाए गए कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर कमीशन दिया गया। इन दावों के बाद मामला राष्ट्रीय राजनीति का, एक बड़ा मुद्दा बन गया और फिर कई वर्षों तक जांच, और उसके साथ कानूनी प्रक्रिया चलती रही
चार दशक तक चलता रहा कानूनी संघर्ष
बोफोर्स मामले में 1990 में CBI ने एफआईआर दर्ज कर के जांच आगे बढ़ाई। उसके बाद के सालों में चार्जशीट दाखिल हुई, कई आरोपियों को राहत मिलती गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 में हिंदुजा ब्रदर्स, तथा बोफोर्स कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी। इस फैसले के खिलाफ जो अपील दायर हुई थी, उस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार करते हुए पूरे प्रकरण को कानूनी तौर पर विराम दे दिया
आखिर क्यों आरोप साबित नहीं हो सके
अदालत के अनुसार जांच एजेंसी आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और भरोसेमंद साक्ष्य जुटाकर अदालत के सामने नहीं रख पाई। विदेशी दस्तावेजों का सत्यापन ठीक ढंग से नहीं हो पाया, कथित कमीशन और आरोपियों के बीच सीधा , प्रत्यक्ष संबंध तथा अन्य जरूरी प्रमाण भी अदालत में स्थापित नहीं हो पाए। और हाँ, लंबे समय तक चली जांच के साथ देरी, ने भी मामले को कमजोर बना दिया
इतिहास में दर्ज रहेगा बोफोर्स विवाद
भले ही बोफोर्स मामला अब कानूनी रूप से खत्म माना जा रहा हो, लेकिन भारतीय राजनीति में इसकी छाप लंबे समय तक बनी रही। यह विवाद कई दौरों तक चुनावी एजेंडा बना रहा, सरकारों पर असर भी दिखा, और देश के सबसे चर्चित रक्षा सौदों में इसे लगातार जगह मिलती रही। बाद में यही बोफोर्स तोप, कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लिए बेहद कारगर साबित हुई और इसकी सामरिक उपयोगिता की भी व्यापक तौर पर सराहना हुई।
