मध्य प्रदेश कांग्रेस की जमीनी हकीकत और सांगठनिक खामियां: कार्यकर्ताओं से कटे चेहरे और 328 पदाधिकारियों की भारी-भरकम सूची पर उठे कड़े सवाल
मध्य प्रदेश कांग्रेस संगठन की जमीनी हकीकत और 328 पदाधिकारियों वाली भारी-भरकम कार्यकारिणी पर गंभीर सवाल उठे हैं। PAC की बैठक में कार्यकर्ताओं के कटे चेहरों और स्थानीय उपेक्षा पर तीखी चर्चा हुई।
मध्य प्रदेश की राजनीति में और कांग्रेस के संगठन के भीतर अभी जो हालात चल रहे है, उन्हें लेकर एक तरह से जमीनी स्तर पर काफी तीखा असंतोष उभर आया है। भोपाल में हाल ही में हुई पॉलिटिकल अफेयर कमेटी , यानी PAC की बैठक में जो बाते उठी, वो सीधे-सीधे पार्टी की कार्यशैली पर , और उसके जमीनी सच पर बड़ा सवाल खड़ा करती दिखी। ऐसा लग रहा है कि संगठन का मौजूदा ढांचा ,और नियुक्तियों वाला तरीका , दोनों ही चीजें आम कार्यकर्ताओं को खासी नागवार लग रही हैं, खासकर उन नेताओं को जो मैदानी जमीन से जुड़े हुए है।
पदाधिकारियों की लंबी फेहरिस्त और नीचे वाले लोगों की दूरी
अभी मध्य प्रदेश कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी में करीब 328 पदाधिकारियों की एक बड़ी सूची दिखाई देती है, लेकिन जमीनी स्तर पर देखने वाली बात ये है कि इनमें से कई चेहरे , पार्टी के ही समर्पित कार्यकर्ता तक के लिए अनजान से बने हुए हैं। संगठन की जमीनी पकड़ कितनी ढीली है , इसका अंदाजा इसी से लगाया जा रहा है कि कई बार वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि भी अपने इलाके के पदाधिकारियों को पहचान नहीं पाते। PAC बैठक के दौरान पूर्व नेता प्रतिपक्ष और PAC सदस्य डॉ. गोविंद सिंह ने इसी मुद्दे पर खुलकर बात की और उन्होंने अपना ही उदाहरण रख दिया। उनका कहना रहा कि वे अपने ही जिले के किसान कांग्रेस अध्यक्ष तक को नहीं जानते। इस तरह की जमीनी फासला वाली स्थिति ने आम कार्यकर्ताओं के बीच निराशा का माहौल बना दिया है, और धीरे धीरे रोष भी बढ़ता जा रहा है।
जिलों में नियुक्तियां, तो फिर स्थानीय उपेक्षा क्यों
काफी समय से ये शिकायतें सुनने को मिल रही थीं कि प्रदेश ,और जिला स्तर पर कुछ ऐसे समर्पित और वरिष्ठ नेता मौजूद हैं जो सालों से संगठन के लिए पसीना बहा रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक कोई ठीक-ठाक जिम्मेदारी या ठोस दायित्व नहीं मिला है। उल्टा इसके, कागजी तौर पर सक्रिय दिखने वाले या बस गैर-सक्रिय चेहरों को पद मिलते रहे हैं। बैठक के दौरान इसी पर काफ़ी तीखी चर्चा हुई। लोगों की बात ये थी कि जब भी नियुक्तियां की जाती हैं, तब मैदानी हालात की बारीक समझ रखने वाले और स्थानीय स्तर पर पकड़ रखने वाले वरिष्ठ नेताओं की राय, या सुझाव , को तरजीह देने की बजाय, दरकिनार कर दिया जाता है। नतीजा ये कि जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है ,और उन्हें लगने लगा है कि उनकी भूमिका महत्व की नही समझी जा रही।
संगठन को और कड़ा-सा करना, और सक्रिय लोगों को वरीयता देना
अब इन सब जमीनी कमी-खामियों और शिकायतों के बीच , कांग्रेस के अंदर संगठन को पूरी तरह बदलने , यानी भंग करके फिर से नए सिरे से गठन करने की सुगबुगाहट तेज हुई है। मैदानी स्तर की नब्ज टटोलने वाले नेताओं का मानना है कि 328 सदस्यों वाली ये भारी भरकम कार्यकारिणी को कम किया जाना चाहिए, और कमान उन्हीं को दी जानी चाहिए जिनकी जमीनी पहचान मजबूत है, और जो सच में सक्रिय रहते हैं। अगर पुनर्गठन के इस दौर में जमीनी कार्यकर्ताओं की बात सुनना , और उपेक्षित वरिष्ठ नेताओं को सम्मान देना , बंद ही रहा तो इसका असर सीधे पार्टी के जनसरोकार और राजनीतिक भविष्य पर पड़ेगा।
