Jabalpur Encroachment : जबलपुर में 3 हजार एकड़ वनभूमि पर अतिक्रमण, टास्क फोर्स करेगी कार्रवाई
Jabalpur Forest Land Encroachment : जांच में कई जगहों पर वनभूमि पर खेती किए जाने की जानकारी सामने आई है। कुछ स्थानों पर लोगों ने बस्तियां भी बना ली हैं।
Jabalpur Forest Land Encroachment : मध्य प्रदेश। जबलपुर वन मंडल की जांच में वनभूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का मामला सामने आया है। विभागीय स्तर पर जिले में 3 हजार एकड़ से ज्यादा वनभूमि पर कब्जे की जानकारी सामने आई है। वहीं शुरुआती जांच में अलग-अलग इलाकों में करीब 500 से 600 हेक्टेयर जमीन अतिक्रमण की चपेट में मिली है। डीएफओ पुनीत सोनकर ने इस मामले को टास्क फोर्स की बैठक में रखा है। अब अलग-अलग मामलों की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की तैयारी है।
सात क्षेत्रों में सामने आया अतिक्रमण
जबलपुर के अलावा कुंडम, पनागर, शहपुरा, बरगी, मझौली और सिहोरा क्षेत्र में भी वनभूमि पर कब्जे मिले हैं। जांच में कई जगहों पर वनभूमि पर खेती किए जाने की जानकारी सामने आई है। कुछ स्थानों पर लोगों ने बस्तियां भी बना ली हैं।
वन विभाग के अनुसार लगातार बढ़ता अतिक्रमण जंगल के प्राकृतिक स्वरूप के लिए चिंता का विषय है। इसका असर वन क्षेत्र के ईकोसिस्टम, जैव विविधता और वन्यजीवों के आवास पर भी पड़ सकता है।
500 से 600 हेक्टेयर जमीन की शुरुआती जांच
डीएफओ पुनीत सोनकर के अनुसार शुरुआती जांच में करीब 500 से 600 हेक्टेयर वनभूमि अतिक्रमण की चपेट में मिली है। हालांकि, विभाग सभी कब्जों को तुरंत अवैध नहीं मान रहा है।
जांच में यह भी देखा जा रहा है कि कुछ लोग वर्ष 2005 से पहले से जमीन पर काबिज तो नहीं हैं। ऐसे लोगों में पात्र व्यक्ति वन अधिकार कानून के तहत पट्टे के हकदार हो सकते हैं। कुछ मामले वर्ष 1980 की पात्र सूची से जुड़े होने की संभावना भी है।
पात्र लोगों को अलग कर होगी कार्रवाई
वन विभाग अब हर मामले की अलग-अलग जांच कर रहा है। अधिकारियों का उद्देश्य पहले पात्र लोगों और संभावित कानूनी दावों की पहचान करना है। जिन लोगों का कब्जा नियमों के तहत पात्र पाया जाएगा, उन्हें अलग किया जाएगा।
इसके बाद जिन मामलों में अवैध अतिक्रमण की पुष्टि होगी, वहां नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। विभाग का कहना है कि बिना कानूनी स्थिति स्पष्ट किए किसी मामले में जल्दबाजी से कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।
‘नारंगी जमीन’ बनी बड़ी कानूनी चुनौती
वनभूमि के कुछ हिस्सों को लेकर रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है। विभागीय रिकॉर्ड में जमीन वन के रूप में दर्ज है, लेकिन उसका कानूनी वर्गीकरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसी जमीन को ‘नारंगी जमीन’ कहा जाता है।
इस स्थिति के कारण कई मामलों में वन विभाग के लिए सीधे कार्रवाई करना आसान नहीं होता। संबंधित जमीन की स्थिति स्पष्ट करने के लिए ऐसे मामलों को भी टास्क फोर्स के सामने रखा गया है।
अधिसूचित नहीं हुई जमीन की भी होगी जांच
डीएफओ के मुताबिक कुछ जमीन अभी तक अधिसूचित नहीं है। ऐसे मामलों में पहले जमीन की कानूनी स्थिति तय करना जरूरी है। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई की जा सकेगी।
टास्क फोर्स की बैठक में इन मामलों को भी रखा गया है। विभाग का प्रयास है कि रिकॉर्ड, कब्जे और जमीन की कानूनी स्थिति की जांच पूरी होने के बाद स्पष्ट निर्णय लिया जाए।
वनभूमि बचाने के लिए कार्रवाई जरूरी
वन विभाग का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद अवैध कब्जों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार वनभूमि पर अतिक्रमण का दायरा लगातार बढ़ने से पहले इसे रोकना जरूरी है।
जंगल की जमीन सुरक्षित रहने से जैव विविधता और वन्यजीवों का आवास भी सुरक्षित रहेगा। अब सभी मामलों की जांच पूरी होने और पात्र दावेदारों की पहचान के बाद कार्रवाई की दिशा स्पष्ट होगी।
