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ओले-बारिश का असर: मौसम के बदलते मिजाज से ‘कंफ्यूज’ हुए पेड़-पौधे, समय से पहले निकल रहीं पत्तियां


नई दिल्ली। Climate Change का असर अब सिर्फ तापमान या मौसम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति के मूल चक्र को भी प्रभावित करने लगा है। भोपाल और आसपास के इलाकों में हालिया ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश ने पेड़-पौधों को ‘कंफ्यूज’ कर दिया है। स्थिति यह है कि जिन पेड़ों को इस समय पतझड़ में होना चाहिए था, उनमें नई पत्तियां और कलियां निकलने लगी हैं। विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक चक्र के साथ ‘धोखा’ मान रहे हैं, जिसका सीधा असर भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।

समय से पहले पत्तियां, बिगड़ा प्राकृतिक चक्र

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों में पाए जाने वाले सागौन जैसे पेड़ गर्मियों में अपने पत्ते गिरा देते हैं। लेकिन इस बार अप्रैल में हुई असामान्य बारिश के कारण उन्हें मानसून जैसा भ्रम हो गया। नतीजतन, पतझड़ के बाद भी उनमें नई पत्तियां निकल आईं। यह बदलाव सामान्य नहीं है और आने वाले समय में पौधों की वृद्धि और उत्पादन पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

खाद्यान्न उत्पादन पर मंडराया संकट

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही स्थिति जारी रही, तो सबसे बड़ा खतरा Food Security पर होगा। मौसम के असंतुलन से फसलों का चक्र प्रभावित हो रहा है। फरवरी में अचानक बढ़ी गर्मी के कारण गेहूं समय से पहले पक गया, जिससे दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए। वहीं, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सब्जियों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे बाजार में कीमतें भी बढ़ने लगी हैं।

‘सडन क्लाइमेट चेंज’ से बढ़ी अनिश्चितता

मौसम में अचानक बदलाव गर्मी में बारिश और सर्दी में गर्मी अब आम होता जा रहा है। वैज्ञानिक इसे ‘सडन क्लाइमेट चेंज’ का परिणाम मानते हैं। इसके पीछे El Niño और La Niña जैसे वैश्विक कारक भी जिम्मेदार माने जाते हैं, जो समुद्री तापमान और हवाओं के जरिए पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करते हैं। हालांकि, इनके ट्रिगर होने के कारणों पर अभी भी शोध जारी है।

ग्लोबल वार्मिंग बना सबसे बड़ा खतरा

Global Warming इस पूरे बदलाव की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। इसके चलते आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक कई तटीय शहरों पर डूबने का खतरा मंडरा सकता है। इसका असर भारत के तटीय क्षेत्रों पर भी पड़ेगा, जहां बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति बन सकती है।

स्वास्थ्य और आयुर्वेद पर भी असर

मौसम के इस असंतुलन का असर अब स्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, हर ऋतु के अनुसार तय उपचार पद्धतियां अब प्रभावित हो रही हैं। मार्च-अप्रैल का ‘संधिकाल’ पहले से ही संवेदनशील माना जाता था, लेकिन अब बदलते मौसम के कारण मरीजों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है। इम्युनिटी बढ़ाने और शरीर को अनुकूल बनाने के लिए नई उपचार पद्धतियों पर जोर दिया जा रहा है।

प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम

विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ता प्रदूषण, वनों की कटाई और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियां इस असंतुलन की मुख्य वजह हैं। “जो बाहर है, वही अंदर है”—इस सिद्धांत के अनुसार प्रकृति में हो रहे बदलाव सीधे मानव जीवन और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।

बेमौसम बारिश और तापमान बदलाव से पेड़-पौधों का चक्र गड़बड़ा गया है, जिससे फसल उत्पादन और फूड सिक्योरिटी पर बड़ा खतरा पैदा हो रहा है।

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