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एक युग का अंत: पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी नहीं रहे, ईमानदार नेतृत्व की मिसाल छोड़ गए

नई दिल्ली । उत्तराखंड की राजनीति और देश के सार्वजनिक जीवन में एक युग का अंत हो गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूरी ने 91 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। देहरादून में उनके निधन की खबर फैलते ही राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने ईमानदारी, अनुशासन और सादगी को जिस तरह से अपनी पहचान बनाया, वह उन्हें भारतीय राजनीति में एक अलग स्थान देता है। उनका जीवन सेना से लेकर संसद और फिर राज्य की राजनीति तक एक प्रेरणादायक यात्रा रहा, जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।

1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूरी की प्रारंभिक शिक्षा और बाद की उच्च शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को मजबूत आधार दिया। शिक्षा के दौरान ही वे स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों से प्रभावित हुए, जिसने आगे चलकर उनके राष्ट्र सेवा के मार्ग को और स्पष्ट किया। इसके बाद उन्होंने भारतीय सेना का रुख किया और 1954 से 1990 तक लगभग 36 वर्षों तक कोर ऑफ इंजीनियर्स में सेवा दी। इस दौरान उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपनी कार्यकुशलता तथा नेतृत्व क्षमता से विशिष्ट पहचान बनाई। सेना में उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया, जो उनके समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण था।

सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और जल्द ही एक सशक्त और ईमानदार नेता के रूप में अपनी पहचान बना ली। 1991 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे और इसके बाद कई बार संसद के लिए चुने गए। संसद में रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण समितियों में कार्य किया और नीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई। सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़े मंत्रालयों में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जहां उन्होंने बुनियादी ढांचे के विकास को नई दिशा देने में योगदान दिया।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भुवन चंद्र खंडूरी राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। 2007 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रशासन में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की नीति अपनाई। उनका कार्यकाल सख्त अनुशासन और जवाबदेही के लिए जाना गया। बाद में उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद संभाला और लोकायुक्त कानून जैसे सुधारों को मजबूत करने की दिशा में प्रयास किए। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कई उतार-चढ़ाव का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उनके सिद्धांत और कार्यशैली हमेशा चर्चा में रहे।

उनकी पहचान केवल एक राजनेता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में जाने गए जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को सर्वोपरि रखा। उनकी सादगी, अनुशासन और निर्णय लेने की स्पष्टता ने उन्हें अलग पहचान दी। आज उनके निधन के साथ ही एक ऐसे नेतृत्व का अध्याय समाप्त हो गया, जिसने ईमानदारी को राजनीति का आधार बनाने की कोशिश की। उनका योगदान न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के राजनीतिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

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