विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी नेटवर्क का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। रोम में हुए कूटनीतिक संवाद और यूरोपीय देशों के साथ बढ़ती साझेदारी ने इस संदेश को और मजबूत किया है कि भारत अब यूरोप और पश्चिम एशिया के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को नए स्तर पर ले जाना चाहता है।
चीन की चिंता का मुख्य कारण IMEC को माना जा रहा है, जिसे कई विश्लेषक चीन के बहुचर्चित Belt and Road Initiative (BRI) के विकल्प या चुनौती के रूप में देखते हैं। यह प्रस्तावित कॉरिडोर भारत से शुरू होकर मध्य पूर्व के देशों से होते हुए यूरोप तक एक नया व्यापारिक मार्ग विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। चीन को आशंका है कि यह नया नेटवर्क उसके मौजूदा वैश्विक व्यापार प्रभाव को कमजोर कर सकता है।
इसके साथ ही, इटली जैसे यूरोपीय देशों की बढ़ती रुचि ने भी बीजिंग की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। पहले जो देश चीन के साथ आर्थिक परियोजनाओं में जुड़े थे, वे अब भारत के साथ सहयोग की संभावनाओं को अधिक गंभीरता से देखने लगे हैं। यही बदलाव चीन की कूटनीतिक रणनीति के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की चिंता का कारण भी यही कॉरिडोर है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी भौगोलिक स्थिति को क्षेत्रीय व्यापार में एक महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, लेकिन IMEC के आने से यह समीकरण बदलते दिख रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह नया मार्ग सफल होता है तो पाकिस्तान की पारंपरिक ट्रांजिट भूमिका प्रभावित हो सकती है।
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक दबाव और कर्ज संकट का सामना कर रहा है, और ऐसे में वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव उसकी रणनीतिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है। यही वजह है कि वहां की राजनीतिक और आर्थिक चर्चाओं में भारत की विदेश नीति और IMEC का प्रभाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।
हालांकि, चीन की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि किसी भी नए कॉरिडोर को प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वैश्विक व्यापार मार्गों में यह बदलाव आने वाले वर्षों में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।