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वैश्विक भारत : उद्योगों की रफ्तार, अर्थव्यवस्था का विस्तार


– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है, जिसकी गति, स्थिरता और विविधता ये तीनों ही उसे विशेष बनाती हैं। इस संबंध में सामने आए आर्थिक आंकड़े इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि देश विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है। विशेष रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में दर्ज प्रगति इस व्यापक आर्थिक मजबूती का स्पष्ट संकेत है।

फरवरी 2026 में भारत की औद्योगिक वृद्धि दर बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई, जोकि जनवरी के 4.8 प्रतिशत से अधिक है। कहना होगा कि यह वृद्धि आर्थिक गतिविधियों में निरंतरता और विस्तार का प्रमाण है। इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा योगदान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का रहा, जिसने छह प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की। चूंकि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत है, इसलिए इसका मजबूत प्रदर्शन पूरी औद्योगिक अर्थव्यवस्था को गति देता है।

वस्‍तुत: मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की यह प्रगति आज कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह उत्पादन क्षमता में वृद्धि को तो दर्शाती ही है, साथ में रोजगार सृजन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्‍वपूर्ण है। भारत जैसे युवा देश में, जहां हर वर्ष लाखों छात्र इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वहां यह क्षेत्र गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराने का प्रमुख माध्यम बनता जा रहा है। फरवरी 2026 में मैन्युफैक्चरिंग के 23 उद्योग समूहों में से 14 में सकारात्मक वृद्धि दर्ज होना इस क्षेत्र की व्यापक मजबूती को दर्शाता है।

विशेष रूप से बुनियादी धातु, मोटर वाहन और मशीनरी एवं उपकरण जैसे क्षेत्रों में दोहरे अंकों की वृद्धि यह संकेत देती है कि भारत का औद्योगिक ढांचा अब अधिक परिपक्व और प्रतिस्पर्धी हो रहा है। बुनियादी धातु क्षेत्र में वृद्धि से निर्माण और अवसंरचना को बल मिलता है, जबकि ऑटोमोबाइल और मशीनरी क्षेत्र कृषि, परिवहन और उद्योगों की उत्पादकता को बढ़ाते हैं। खनन और बिजली क्षेत्र भी इस विकास यात्रा में पीछे नहीं हैं। फरवरी में खनन क्षेत्र में 3.1 प्रतिशत और बिजली उत्पादन में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ये दोनों क्षेत्र औद्योगिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाते हैं और इनमें वृद्धि का अर्थ है कि उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल और ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है।

इसके अलावा उपयोग-आधारित वर्गीकरण के आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था के भीतर हो रहे संरचनात्मक परिवर्तन को उजागर करते हैं। पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि यह दर्शाती है कि उद्योगों में निवेश बढ़ रहा है। मशीनों और उपकरणों का अधिक उत्पादन इस बात का संकेत है कि उद्योग विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिससे भविष्य में उत्पादन, आय और रोजगार में और वृद्धि होगी।

इसी प्रकार उपभोक्ता वस्तुओं, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेफ्रिजरेटर और टीवी के उत्पादन में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि देश में मांग का स्तर बढ़ रहा है। यह बढ़ती आय, मध्यम वर्ग के विस्तार और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। जब उपभोक्ता खर्च बढ़ता है, तब यह पूरे आर्थिक चक्र को गति देता है, उत्पादन बढ़ता है, रोजगार सृजित होते हैं और निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।

यहां उल्‍लेखित है कि भारत की आर्थिक मजबूती का एक अन्य प्रमुख आधार सरकार द्वारा अवसंरचना क्षेत्र में किया जा रहा भारी निवेश है। राजमार्गों, बंदरगाहों और रेलवे परियोजनाओं में लगातार बढ़ते निवेश के कारण अवसंरचना और निर्माण सामग्री क्षेत्र में फरवरी में 11.5 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। निश्‍चित ही यह उस दीर्घकालिक दृष्टि का परिणाम है, जिसके तहत सरकार देश को एक मजबूत लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी नेटवर्क प्रदान कर रही है।

इन परियोजनाओं का प्रभाव बहुआयामी है। एक ओर ये बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करती हैं, वहीं दूसरी ओर उद्योगों के लिए लागत कम करती हैं और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाती हैं। बेहतर सड़क और रेल नेटवर्क से माल परिवहन तेज और सस्ता होता है, जिससे निर्यात को भी बढ़ावा मिलता है। यदि व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो भारत की अर्थव्यवस्था कई अन्य सकारात्मक संकेत भी दे रही है। देश की जीडीपी वृद्धि दर विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसे अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक भी भारत को आने वाले वर्षों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देख रहे हैं।

भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का प्रवाह लगातार बना हुआ है, जो वैश्विक निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘पीएलआई (उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन)’ जैसी योजनाओं ने मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात को नई दिशा दी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। साथ में देखने में आ रहा है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था भी भारत की ताकत का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरी है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) जैसे प्लेटफॉर्म ने लेन-देन को सरल और पारदर्शी बनाया है। इससे न सिर्फ वित्तीय समावेशन बढ़ा है, बल्कि छोटे और मध्यम उद्यमों को भी नई ऊर्जा मिली है।

महंगाई पर नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन भी भारत की आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाते हैं। सरकार द्वारा संतुलित राजकोषीय नीति और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों ने अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि वैश्विक स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद हैं, जैसे भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव फिर भी यहां अच्‍छी बात यह है कि भारत ने अपनी नीतिगत दृढ़ता और आंतरिक मांग के बल पर इनका प्रभाव सीमित रखा है।

अंततः, फरवरी 2026 के भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) आंकड़े सिर्फ एक महीने की उपलब्धि न होकर यह उस निरंतर प्रयास और नीति-निर्माण का परिणाम हैं, जोकि भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग की गति, पूंजीगत निवेश में वृद्धि, उपभोक्ता मांग का विस्तार और अवसंरचना पर फोकस, कहना होगा कि ये सभी मिलकर आज एक ऐसे आर्थिक परिदृश्य का निर्माण कर रहे हैं, जोकि आने वाले वर्षों में भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्तियों में स्थापित कर सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत वर्तमान में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और उसके विकास की दिशा भी फिलहाल सुदृढ़ और टिकाऊ है।

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