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वैश्विक मानकों की ओर बढ़ा भारत, नई पीपीआई प्रणाली से उद्योग और महंगाई विश्लेषण को मिलेगी नई मजबूती

नई दिल्ली । देश में महंगाई मापन प्रणाली को आधुनिक और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सरकार ने नए प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स फ्रेमवर्क को लागू किया है। इस बदलाव का अर्थशास्त्रियों, उद्योग संगठनों और बाजार विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। उनका मानना है कि नई व्यवस्था से मूल्य परिवर्तनों की निगरानी अधिक व्यापक और सटीक तरीके से की जा सकेगी, जिससे आर्थिक नीतियों के निर्माण में भी बेहतर सहायता मिलेगी।

नई प्रणाली के तहत संशोधित थोक मूल्य सूचकांक के साथ आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स, इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स और सेवा क्षेत्र के लिए प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स को भी लागू किया गया है। इसके लिए वर्ष 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है। यह बदलाव देश की मूल्य मापन प्रणाली में व्यापक सुधार का हिस्सा माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक महंगाई का आकलन मुख्य रूप से थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर किया जाता था। नई व्यवस्था उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य परिवर्तनों को अधिक गहराई से समझने का अवसर प्रदान करेगी। इससे उत्पादन लागत, आपूर्ति श्रृंखला और बाजार में कीमतों के रुझानों का अधिक प्रभावी विश्लेषण संभव होगा।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह पहल भारत की सांख्यिकीय प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मानकों के करीब ले जाएगी। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स का उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है और इसे मूल्य दबावों का प्रारंभिक संकेतक माना जाता है। ऐसे में भारत में इसका विस्तार आर्थिक विश्लेषण की गुणवत्ता को मजबूत करेगा।

नई व्यवस्था के साथ सरकार अगले पांच वर्षों तक पुरानी और नई दोनों प्रणालियों के आंकड़े समानांतर रूप से जारी करेगी। इससे उद्योग, शोध संस्थान, वित्तीय संस्थाएं और नीति निर्माता नई प्रणाली को समझने तथा उसके अनुरूप अपने विश्लेषण को ढालने में सक्षम होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यह संक्रमण अवधि किसी भी प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयों को कम करने में मदद करेगी।

इस बीच जारी आंकड़ों के अनुसार मई महीने में थोक महंगाई दर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में कीमतों में तेजी इसका प्रमुख कारण रही है। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की लागत बढ़ने से उत्पादन और परिवहन संबंधी खर्चों पर दबाव बढ़ा है, जिसका प्रभाव थोक कीमतों में दिखाई दिया।

विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता और भू-राजनीतिक परिस्थितियां अभी भी मूल्य दबाव का प्रमुख स्रोत बनी हुई हैं। हालांकि हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बाद ऊर्जा कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है, लेकिन अनिश्चितता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा काफी हद तक वैश्विक बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

नई सीरीज के तहत वस्तुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। इससे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में अधिक व्यापक होगा। साथ ही मूल्यांकन प्रक्रिया में आधुनिक पद्धतियों और उत्पादन आधारित आंकड़ों को शामिल किया गया है, जिससे परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स प्रणाली का विस्तार केवल सांख्यिकीय सुधार नहीं बल्कि आर्थिक प्रबंधन को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे उद्योगों में लागत दबावों की पहचान समय रहते हो सकेगी और महंगाई से संबंधित जोखिमों पर बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी।

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