साठ के दशक का समय हिंदी सिनेमा में संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दौर में मोहम्मद रफी की आवाज ने लाखों दिलों पर राज किया। उनकी गायकी में ऐसा दर्द और ऐसा जादू था जो सीधे दिल को छू लेता था। जब भी किसी फिल्म में गहरे भावनात्मक गीत की जरूरत होती थी तो निर्माता और संगीतकार सबसे पहले रफी साहब को याद करते थे। उनकी आवाज में वह शक्ति थी जो कहानी को जीवंत बना देती थी।
फिल्म नौनिहाल के निर्माता सावन कुमार टाक थे। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रभावित थे। जब 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन की खबर आई तो वे गहरे दुख में डूब गए। उन्होंने तय किया कि वे नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए एक फिल्म बनाएंगे। इस सोच से फिल्म नौनिहाल की शुरुआत हुई। इस फिल्म की कहानी एक अनाथ बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है जो अपने जीवन में एक बड़ी यात्रा पर निकलता है और भावनात्मक मोड़ से गुजरता है।
फिल्म के लिए एक ऐसा गीत चाहिए था जो दर्शकों के दिल को झकझोर दे। गीतकार कैफी आजमी ने इस भावनात्मक गीत को लिखा। जब इस गीत को आवाज देने की बात आई तो मोहम्मद रफी का नाम चुना गया। रफी साहब ने जब इस गीत को अपनी आवाज दी तो उसमें एक गहरी संवेदना और दर्द समा गया।
फिल्म रिलीज से पहले सावन कुमार टाक ने इसे टैक्स फ्री कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने से पहले कहा कि वे कोई गीत सुनना चाहेंगी। इसके बाद सावन कुमार ने टेप रिकॉर्डर पर रफी की आवाज में वह गीत सुनाया। जैसे ही गीत बजना शुरू हुआ पूरा माहौल भावनाओं से भर गया।
गीत की पंक्तियां सुनते सुनते इंदिरा गांधी अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की यादों में खो गईं। उनकी आंखें नम हो गईं और वे कुछ देर के लिए बहुत भावुक हो गईं। कुछ समय बाद वे अपने केबिन में चली गईं। इस भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री करने का निर्णय लिया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं की गहराई तक पहुंचने वाली शक्ति है और मोहम्मद रफी की आवाज उस शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण रही है।