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मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, घोषित करने की आवश्यकता नहीं

नई दिल्ली। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को नागपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अयोध्या राम मंदिर और भारत की सांस्कृतिक पहचान को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सत्ता में बैठे लोगों की प्रतिबद्धता और देशभर के लोगों के सहयोग से संभव हुआ है।

यह कार्यक्रम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा उन लोगों के सम्मान में आयोजित किया गया था, जिन्होंने राम मंदिर निर्माण में नेतृत्व और योगदान दिया। भागवत ने कहा कि राम मंदिर भगवान राम की इच्छा का प्रतीक है और इसके निर्माण में पूरे समाज की भागीदारी रही है। उन्होंने इसकी तुलना गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा से करते हुए कहा कि जैसे भगवान कृष्ण की उंगली पर पर्वत टिक गया था, वैसे ही यह मंदिर भी सामूहिक सहयोग से संभव हुआ।

भागवत ने योगी अरविंद का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए भारत का उभार आवश्यक है। उनके अनुसार यह प्रक्रिया 1857 से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों का जिक्र करते हुए ‘द गार्डियन’ के एक लेख का हवाला दिया, जिसमें भारत की राजनीतिक और ऐतिहासिक दिशा पर टिप्पणी की गई थी। भागवत ने कहा कि तकनीकी रूप से आजादी 1947 में मिली थी, लेकिन वास्तविक आत्मविश्वास बाद में मजबूत हुआ।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि सत्ता में बैठे लोग प्रतिबद्ध नहीं होते और जनआंदोलन नहीं चलता, तो राम मंदिर का निर्माण संभव नहीं था। भागवत के अनुसार, पहले ‘हिंदू राष्ट्र’ की बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन अब यह विचार व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने लगा है।

उन्होंने कहा कि जैसे सूरज का पूर्व से उगना एक प्राकृतिक सत्य है और उसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही भारत का हिंदू राष्ट्र होना भी एक वास्तविकता है। अंत में उन्होंने कहा कि अब समय है देश को और अधिक समृद्ध और मजबूत बनाने की दिशा में काम करने का, और भारत का उदय पूरी दुनिया के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएगा।

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