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दिलजीत दोसांझ की सतलुज पर सियासी संग्राम तेज अकाली दल ने हर गांव में स्क्रीनिंग का किया ऐलान


नई दिल्ली । पंजाबी अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। फिल्म को रिलीज के कुछ समय बाद ही प्लेटफॉर्म से हटाए जाने पर कई संगठनों ने सवाल उठाए हैं। इसी बीच शिरोमणि अकाली दल ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि वह इस फिल्म को पंजाब के हर गांव और हर क्षेत्र में लोगों तक पहुंचाएगा ताकि नई पीढ़ी राज्य के इतिहास के उस दौर से परिचित हो सके जिसे लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं और परिस्थितियों को दिखाया गया है उन्हें समाज के सामने आना चाहिए। उनका कहना है कि पंजाब के कठिन दौर को समझना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है और इसी उद्देश्य से पार्टी गांव गांव में फिल्म की स्क्रीनिंग करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास से जुड़े विषयों को लोगों तक पहुंचने से रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से प्रेरित बताई जा रही है। फिल्म में 1990 के दशक के दौरान पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों से जुड़े मामलों की पृष्ठभूमि को दिखाया गया है। खालड़ा ने उस समय कथित तौर पर ऐसे मामलों की जांच कर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखने का दावा किया था। यही विषय फिल्म के केंद्र में है और इसी कारण यह चर्चा का विषय बनी हुई है।

फिल्म के ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर व्यापक बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग उठाई जबकि कुछ संगठनों ने सार्वजनिक प्रदर्शन की घोषणा की। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं जिससे मामला और अधिक चर्चा में आ गया।

इसी क्रम में सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने भी 14 जुलाई को विशेष अरदास आयोजित करने की घोषणा की है। यह कार्यक्रम हरीके पत्तन स्थित सतलुज नदी के किनारे आयोजित किया जाएगा जहां उन लोगों की आत्मा की शांति और उनके परिवारों के लिए न्याय की प्रार्थना की जाएगी जिनका उल्लेख उस दौर की घटनाओं के संदर्भ में किया जाता है। धार्मिक सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर फिल्म को हटाने के फैसले को लेकर भी अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्मों की समीक्षा जरूरी है जबकि अन्य इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं। इसी बीच यह भी जानकारी सामने आई है कि संबंधित मामले की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित किए जाने की बात कही गई है ताकि पूरे घटनाक्रम की जांच की जा सके।

फिलहाल सतलुज फिल्म केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह गई है बल्कि यह इतिहास राजनीति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर होने वाले फैसले और घटनाक्रम पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।

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