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शिक्षा व्यवस्था की हकीकत: मध्यप्रदेश के स्कूलों में शौचालय संकट उजागर


मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। प्रदेश के 788 सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं होने या अधूरे पड़े होने की वजह से ‘स्वच्छ भारत मिशन’ और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे बड़े अभियानों की जमीनी हकीकत उजागर हो गई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए करीब 2 करोड़ 30 लाख रुपए का बजट जारी किया गया था, लेकिन कई जगह इस राशि का उपयोग शौचालय निर्माण के बजाय फर्नीचर, रंगाई-पुताई और अन्य कार्यों में कर लिया गया। नतीजा यह हुआ कि आज भी कई स्कूलों में छात्राओं को खुले मैदान, दीवार की ओट या अस्थायी व्यवस्था के सहारे शौच जाना पड़ रहा है।

राज्य के कई जिलों अशोकनगर, सीहोर और राजगढ़ से सामने आई रिपोर्टें स्थिति की गंभीरता को और उजागर करती हैं। कहीं सिर्फ टूटी दीवारों के सहारे शौचालय का “नाम” बचा है, तो कहीं छात्राएं महिला शिक्षकों की निगरानी में असुरक्षित परिस्थितियों में शौच के लिए जाने को मजबूर हैं। कई जगह तो हालत इतनी खराब है कि छात्राओं को आपात स्थिति में घर लौटना पड़ता है या स्कूल छोड़ना पड़ता है।

राजगढ़ के एक प्राथमिक विद्यालय में 26 छात्राएं बिना शौचालय के पढ़ाई कर रही हैं, जबकि अशोकनगर के एक स्कूल में 135 बच्चों को अस्थायी रूप से कॉलेज परिसर के एक कमरे में शिफ्ट किया गया है, जहां शौचालय की सुविधा ही नहीं है।

इस बीच भ्रष्टाचार के भी गंभीर मामले सामने आए हैं। धार जिले में लोकायुक्त ने एक डीपीसी अधिकारी को 1 लाख रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा है। आरोप है कि अधिकारी ने 122 शौचालयों के निर्माण से पहले ही कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) जारी करने के बदले 17 लाख रुपए की मांग की थी।

शिक्षा मंत्री ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यदि शौचालय निर्माण में किसी भी प्रकार की लापरवाही पाई जाती है तो उसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी।

फिलहाल यह पूरा मामला शिक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और विकास योजनाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, जहां कागजों पर सुविधाएं पूरी दिख रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर छात्राएं आज भी बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं।

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