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भोपाल में लोकार्पित हुई सुरेश पटवा की 34वीं कृति ‘व्यंग्य-पच्चीसी’, साहित्यकारों ने बताया समकालीन विसंगतियों पर तीखा प्रहार


मध्यप्रदेश । राजधानी भोपाल के दुष्यंत संग्रहालय में वरिष्ठ साहित्यकार Suresh Patwa के नवीन व्यंग्य संग्रह ‘व्यंग्य-पच्चीसी’ का गरिमामय लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। यह कृति लेखक की 34वीं प्रकाशित पुस्तक है, जिसे साहित्य जगत में विशेष महत्व के साथ देखा जा रहा है। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और व्यंग्य लेखन से जुड़े अनेक विद्वानों, लेखकों और साहित्य प्रेमियों ने सहभागिता की।

समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार मुकेश वर्मा ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. संजय सक्सेना उपस्थित रहे। सारस्वत अतिथि के रूप में डॉ. मोहन तिवारी आनंद और विवेक रंजन श्रीवास्तव ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने सुरेश पटवा के साहित्यिक योगदान और उनकी नई कृति पर विस्तार से चर्चा की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में मुकेश वर्मा ने कहा कि सुरेश पटवा के व्यक्तित्व में खुलापन, निर्भीकता और प्रतिरोध की स्वाभाविक चेतना दिखाई देती है। यही विशेषताएं उनकी लेखनी को धार देती हैं और उन्हें एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में स्थापित करती हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक विसंगतियों के प्रति उनकी सजग दृष्टि उनकी रचनाओं को विशिष्ट बनाती है।

मुख्य अतिथि डॉ. संजय सक्सेना ने कहा कि सुरेश पटवा की लेखनी मौलिकता, गहरी सामाजिक समझ और मानवीय संवेदनाओं से समृद्ध है। उनके अनुसार ‘व्यंग्य-पच्चीसी’ केवल व्यंग्य रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन समाज की विडंबनाओं का सजीव दस्तावेज है। उन्होंने इसे लेखक की रचनात्मक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

अपने संबोधन में सुरेश पटवा ने प्रसिद्ध व्यंग्यकार Harishankar Parsai को अपना प्रेरणास्रोत बताया। उन्होंने कहा कि परसाई का साहित्य और उनकी अध्ययनशीलता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। पटवा ने कहा कि बुंदेलखंड की व्यंग्यात्मक जीवन शैली, लोकभाषा और सामाजिक अनुभवों ने उनके लेखन को समृद्ध बनाया है। उन्होंने बताया कि उनकी रचनाओं में व्यंग्य किसी कृत्रिम प्रयास से नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति का हिस्सा बनकर उभरता है।

डॉ. मोहन तिवारी आनंद ने कहा कि सुरेश पटवा एक बहुआयामी रचनाकार हैं, जो विषय की पूरी तैयारी और अध्ययन के साथ लेखन करते हैं। उनकी बेलौस शैली और निर्भीक अभिव्यक्ति पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है। वहीं विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कहा कि बैंक सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी पटवा साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं और 74 वर्ष की आयु में 34 पुस्तकों का लेखन उनकी रचनात्मक ऊर्जा का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि पटवा का साहित्य केवल कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों से उपजा है। लद्दाख और भूटान जैसी यात्राओं के अनुभव भी उनकी रचनाओं में यथार्थ और संवेदनशीलता का विस्तार करते हैं।

कार्यक्रम में प्रस्तुत व्यंग्य पाठ विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विभिन्न रचनाकारों ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को हंसने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर किया। व्यंग्यकारों की प्रस्तुतियों को दर्शकों ने खूब सराहा और सभागार देर तक तालियों की गूंज से भरता रहा।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. आदित्य हरि गुप्ता ने किया, जबकि शारदा दयाल श्रीवास्तव ने ‘व्यंग्य-पच्चीसी’ की समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह कृति समकालीन सामाजिक और राजनीतिक विद्रूपताओं पर प्रभावशाली प्रहार करती है। उन्होंने इसे नई पीढ़ी के व्यंग्यकारों के लिए प्रेरणादायी पुस्तक बताया।

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