देश के सबसे बड़े न्यूक्लियर प्लांट से हटेगा सॉफ्टवेयर! रूसी हार्डवेयर तकनीक का होगा इस्तेमाल, साइबर खतरे से निपटने की तैयारी में भारत
कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की यूनिट 3 और 4 के लिए रूस की रोसाटॉम ने करीब 300 सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति पूरी की। जानिए नई हार्डवेयर आधारित तकनीक की खासियत।


Kudankulam Nuclear Plant: भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक अहम कदम उठाया गया है। तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट की तीसरी और चौथी इकाई के लिए रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम ने करीब 300 उपकरणों की आपूर्ति पूरी कर दी है। इन उपकरणों का इस्तेमाल रिएक्टर की सुरक्षा प्रणाली में किया जाएगा, जहां तकनीकी गड़बड़ी या आपात स्थिति सामने आने पर जरूरी सुरक्षा प्रक्रियाएं अपने आप सक्रिय हो सकती हैं।
इस नई व्यवस्था की खास बात यह है कि इसमें कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षा कार्यों के लिए ऐसे मॉड्यूल इस्तेमाल किए गए हैं, जो सेंसर से मिलने वाले संकेतों को माइक्रोप्रोसेसर के बिना प्रोसेस कर सकते हैं। इससे सुरक्षा प्रणाली की एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
कुडनकुलम प्लांट के लिए 300 उपकरणों की आपूर्ति
रोसाटॉम की इकाई रोसाटॉम ऑटोमेटेड कंट्रोल सिस्टम्स ने 20 अक्टूबर 2026 को बताया कि कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र की यूनिट 3 और 4 के लिए सुरक्षा प्रणाली से जुड़े उपकरणों की आपूर्ति पूरी कर दी गई है।
कंपनी के मुताबिक, दोनों इकाइयों के लिए कुल करीब 300 उपकरण तैयार करके भेजे गए हैं। इनका संबंध इंजीनियर्ड सेफ्टी फीचर्स एक्टुएशन सिस्टम (ESFAS) से है। यह प्रणाली रिएक्टर के संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण मापदंडों पर नजर रखती है और असामान्य स्थिति में सुरक्षा उपकरणों को सक्रिय करने में मदद करती है।
क्या है नई हार्डवेयर आधारित तकनीक?
नई सुरक्षा व्यवस्था में नॉन-प्रोग्रामेबल मॉड्यूल का इस्तेमाल किया गया है। ये मॉड्यूल सेंसर से मिलने वाले संकेतों को माइक्रोप्रोसेसर के बिना प्रोसेस कर सकते हैं। इससे सुरक्षा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कार्यों के लिए एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर पर निर्भरता घटती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे परमाणु बिजली संयंत्र से सॉफ्टवेयर हटा दिया गया है। यह तकनीक सुरक्षा प्रणाली के खास हिस्सों में इस्तेमाल की जा रही है, ताकि कुछ प्रकार की तकनीकी गड़बड़ियों का असर कम किया जा सके।
आपात स्थिति में कैसे काम करेगी सुरक्षा प्रणाली?
परमाणु रिएक्टर में तापमान, दबाव या अन्य संचालन संबंधी मापदंड तय सीमाओं से बाहर जाने पर सुरक्षा प्रणाली संबंधित उपकरणों को सक्रिय करने के लिए संकेत दे सकती है। इसमें बोरॉन इंजेक्शन पंप जैसे सुरक्षा उपकरण भी शामिल हो सकते हैं।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य रिएक्टर को सुरक्षित स्थिति में लाना और दुर्घटना की आशंका कम करना है। हालांकि, किसी भी सुरक्षा प्रणाली की वास्तविक प्रभावशीलता उसके डिजाइन, परीक्षण, रखरखाव और दूसरी सुरक्षा व्यवस्थाओं के साथ समन्वय पर निर्भर करती है।
साइबर सुरक्षा के लिहाज से क्यों अहम है यह कदम?
परमाणु संयंत्रों में डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है। सॉफ्टवेयर में खामी, उपकरणों की खराबी या साइबर घटना संचालन संबंधी जोखिम पैदा कर सकती है। ऐसे में सुरक्षा से जुड़े कुछ कार्यों को नॉन-प्रोग्रामेबल हार्डवेयर के जरिए संचालित करना संभावित जोखिमों को सीमित करने की एक रणनीति है।
कुडनकुलम संयंत्र का नाम पहले भी साइबर सुरक्षा से जुड़े मामलों में सामने आ चुका है। वर्ष 2019 में यहां प्रशासनिक नेटवर्क में मैलवेयर संक्रमण की पहचान हुई थी। भारत सरकार ने संसद में बताया था कि प्रभावित नेटवर्क रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों के लिए इस्तेमाल होता था और वह संयंत्र के नियंत्रण एवं इंस्ट्रूमेंटेशन सिस्टम से अलग था। उस समय सरकार के अनुसार, रिएक्टर के नियंत्रण तंत्र पर इसका असर नहीं पड़ा था।
जुलाई 2026 में संयंत्र से संबंधित कुछ दस्तावेजों के कथित डेटा लीक की खबर भी सामने आई थी। जानकारी के मुताबिक, लीक हुए दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी थी। इन घटनाओं के संदर्भ में परमाणु संयंत्रों की साइबर सुरक्षा और संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा का महत्व फिर चर्चा में आया।
आगे क्या होगा?
उपकरणों की आपूर्ति पूरी होना परियोजना का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसके बाद इन्हें निर्धारित स्थानों पर स्थापित करना और जरूरी परीक्षण करना भी आवश्यक होगा। जानकारी के अनुसार, आगे स्थापना के बाद अलग-अलग स्तरों पर परीक्षण और कमीशनिंग से जुड़ी प्रक्रियाएं की जाएंगी।
नई व्यवस्था का उद्देश्य कुडनकुलम की तीसरी और चौथी इकाई में सुरक्षा प्रणालियों की विश्वसनीयता बढ़ाना और कुछ अहम सुरक्षा कार्यों को सॉफ्टवेयर संबंधी संभावित गड़बड़ियों से अधिक सुरक्षित बनाना है।








