Pakistan Political Crisis: इमरान से लेकर PoJK तक फंसे शहबाज शरीफ, सिंधु जल संधि पर भारत को दी गीदड़भभकी
पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने अपनी राजनीतिक विफलताओं, इमरान खान के जेल संकट और PoJK में JAAC के विरोध को छिपाने के लिए सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाया है। अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले के बाद से भारत ने आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए संधि को स्थगित कर रखा है।
राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार, जैसी कि हालत है, पूरी तरह लुढ़क सी चुकी है.. अब जनता का ध्यान हटाने के लिए वो फिर भारत के खिलाफ बयानबाजी का सहारा ले रही है। 14 अगस्त के जश्न से पहले इस्लामाबाद में हुए एक कार्यक्रम में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को अपनी ‘रेड लाइन’ कह दिया, और बस फिर क्या था, कूटनीतिक हलचल इधर उधर मच गई। शरीफ ने भारत पर आरोप लगाया कि पानी की हर बूंद जरूरी है, इस पर कोई समझौता नहीं होगा, और फिर भारत को शांति का दुश्मन बता कर कहा कि एकतरफा तरीके से संधि रोकना गलत है। साथ ही यह भी जोड़ दिया: पानी को लेकर जो भी कदम होंगे, उनका जवाब दिया जाएगा। लेकिन इस तरह की राजनीतिक गर्माहट के पीछे पाकिस्तान का वो खोखलापन है, जिसे देश इस वक्त बर्दाश्त कर रहा है।
इमरान खान की गिरफ्तारी और PTI का सरकार पर दबाव,
शहबाज शरीफ की ये बेचैनी दरअसल पाकिस्तान के अंदर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल से जुड़ी बताई जा रही है। पूर्व पीएम इमरान खान जेल की सलाखों के पीछे हैं, और इसी वजह से पाकिस्तान की सियासत मानो दो भागों में बंट सी गई है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेता और उनके समर्थक लगातार सड़कों पर उतर कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि इमरान और उनकी पार्टी के खिलाफ राजनीतिक दुर्भावना से कार्रवाई की जा रही है। सरकार और विपक्ष के बीच ये भारी खींचतान प्रशासन को लगभग ठहर सी गई स्थिति में ले आई है।
PoJK में भड़की राजनीतिक बगावत , JAAC का कड़ा विरोध
राजनीतिक अस्थिरता की ये आग अब पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) तक पहुंच गई है। वहाँ Joint Awami Action Committee (JAAC) ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय अधिकारों वगैरह की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जुलाई के अंत में हिंसा और झड़पें भड़कने के बाद सरकार की नींद मानो उड़ गई। चुनाव प्रक्रिया को लेकर JAAC और PTI ने आपत्तियां जताईं, और कुछ चरणों का बहिष्कार भी किया गया। सरकार ने विरोध को दबाने के लिए सुरक्षा बढ़ाई और इंटरनेट बंद कर दिया, मगर फिर भी अगस्त में चुनाव के अंतिम चरण को टालना पड़ा।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सरकार की राजनीतिक हार
अलगाववाद और आतंकवाद की तरफ भी पाकिस्तान सरकार के मोर्चे पर प्रदर्शन कमजोर ही रहा है। बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी समूहों ने 14 अगस्त को ‘ब्लैक डे’ मनाने की घोषणा की, और सरकारी कार्यक्रमों के बहिष्कार, काले झंडे, काली पट्टी वगैरह के जरिए विरोध की अपील की। सरकार ने 12 अगस्त को बलूचिस्तान में अभियान चलाकर 10 आतंकवादियों को मारने का दावा किया, पर उसी दिन सुराब में एक कार बम धमाका हो गया। इसमें 8 हथियारबंद लोग भी मरे और 3 आम नागरिक भी, जिससे मामला और संवेदनशील बन गया। सेना पर मानवाधिकार हनन जैसी दलीलें उठती रही हैं। इधर, खैबर पख्तूनख्वा के स्वात में 2 अगस्त को काबल पुलिस स्टेशन के पास आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 17 लोग मारे गए और 34 घायल। बताया गया कि ये हमला उस समय हुआ जब लोग आतंकवाद के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।
भारत की साफ नीति: आतंकवाद और पानी साथ-साथ नहीं
शहबाज शरीफ पानी को राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बताने की कोशिश कर रहे हैं, मगर भारत ने अप्रैल 2025 में ही अपना कूटनीतिक स्टैंड स्पष्ट कर दिया था। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद , जिसमें 26 लोग मारे गए, भारत की कूटनीति की दिशा बदल गई। 23 अप्रैल को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में सिंधु जल संधि को स्थगित करने का सख्त फैसला लिया गया। नई दिल्ली ने दुनिया को साफ कहा कि 1960 के समझौते का माहौल खत्म हो चुका है, और सीमा पार आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना पानी पर कोई बातचीत नहीं होगी। शरीफ की ये गीदड़भभकी दरअसल अपने ही घर में लगी आतंकवाद और राजनीतिक संकट की आग को ढकने का एक असफल प्रयास जैसी लगती है।
