शिवराज बोले, समरसता के कामों में विनोद जी का मार्गदर्शन अहम रहा
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सामाजिक समरसता के कामों में विनोद जी के मार्गदर्शन का जिक्र किया।

पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान शुक्रवार को RSS के वरिष्ठ प्रचारक विनोद कुमार की श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता से जुड़े कई वैचारिक फैसलों और योजनाओं में विनोद जी की नजर और सलाह काम आती थी। सभा में संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख दीपक विस्पुते ने कहा कि विनोद जी राष्ट्र के कार्य, संगठन-निष्ठा और समाज के लिए संवेदना का अनोखा उदाहरण थे।
पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, अशोक जी पांडे, गोरेलाल और कई दूसरे वरिष्ठजन भी मौजूद रहे। सभी ने विनोद कुमार से जुड़े अपने अनुभव बांटे और उन्हें दिल से श्रद्धांजलि दी।
रविदास महाकुंभ से भीमा नायक तक, शिवराज ने गिनाए योगदान
शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि संत रविदास महाकुंभ, टंट्या मामा भील और भीमा नायक से जुड़े काम और योजनाएं बनते समय विनोद जी की अंतर्दृष्टि का खास हाथ रहा। उनके मुताबिक समरसता जैसे विषय को विनोद जी बारीकी से समझते थे और उनकी सलाह से समाज के अलग-अलग तबकों को साथ लाने की सोच मिलती थी।
शिवराज ने यह भी कहा कि विनोद कुमार बाहर से बेहद कड़क नजर आते थे, मगर भीतर से बहुत नरम थे। उनके व्यवहार में अनुशासन और अपनापन साथ-साथ था। कुछ और यादें बांटते हुए उन्होंने कहा कि उनके बताए रास्ते पर चलें, तो भारत माता को परम वैभव पर पहुंचाने में हम अपना योगदान दे पाएंगे।
सोलंकी ने कहा, सभा संकल्प लेने का भी मौका
पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि ऐसी सभा में फूल चढ़ाना ही सब कुछ नहीं है। यह विनोद जी की जिंदगी को समझने और उनके आदर्शों पर चलने का वादा करने का भी मौका है। प्रचारक का जीवन बाहर से भले नजर न आए, पर अपने काम, बर्ताव और आत्मीय रिश्तों से वह अनगिनत दिलों में स्थायी जगह बना लेता है।
सोलंकी ने कई संस्मरण सुनाए। अंतिम दिनों की याद पर वे भावुक हो उठे। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले अस्पताल में विनोद जी से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी हालत देखकर वे दुखी हो गए। विनोद जी बोल नहीं पा रहे थे और ऑक्सीजन की पाइप लगी थी। इसी का जिक्र करते हुए उन्होंने अपना लगाव और उनके न रहने से आई कमी जाहिर की।
दीपक विस्पुते: कारोबारी राह छोड़ संघ को चुना
विस्पुते के अनुसार विनोद जी ऊंची पढ़ाई कर चुके थे और चाहते तो सफल कारोबार की राह पकड़ सकते थे, पर उन्होंने सारा जीवन संघ के काम में लगा दिया। लगभग 55 साल चले प्रचारक जीवन में वे प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य जैसी भूमिकाओं में रहे। बारीकी से काम करना, आग्रह के साथ काम कराना, इंसान को परखना और कार्यकर्ताओं की चिंता करना उनके गुण थे। विस्पुते ने कहा कि डॉ. हेडगेवार को सीधे देखने का मौका नहीं मिला, मगर विनोद जी जैसे लोगों से समझ आता है कि संघमय जीवन क्या है। उनके अनुसार संघ को सिर्फ किताबों से नहीं, ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं की जिंदगी से भी जाना जा सकता है। उनका जीवन संघ की कार्यपद्धति समझने भर का जरिया नहीं, संघमय जीवन जीने की प्रेरणा भी है।
विरोधी भी थे सादगी के प्रशंसक
विस्पुते ने बताया कि विरोध करने वाले भी विनोद जी की सादगी और जीवन-मूल्यों की तारीफ करते थे। आकर्षण और आत्मप्रचार से दूरी उनके जीवन में सहज दिखती थी। अपना संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब वे प्रचारक का दायित्व छोड़कर घर लौटने की सोच रहे थे, तब विनोद जी की बातचीत और मार्गदर्शन का असर ऐसा रहा कि वह ख्याल फिर नहीं आया। उनका कहना था कि चित्र पर फूल चढ़ाना काफी नहीं, उनके जीवन की प्रेरणा को आचरण में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अशोक जी पांडे ने कहा, प्रतिज्ञा को जीना उनसे सीखें
अशोक जी पांडे ने विनोद जी को कार्यकर्ता की चिंता, समाज के प्रति संवेदना, जीवन की प्रामाणिकता और दूरदृष्टि का प्रतीक बताया। उनके अनुसार किसी विचार या प्रतिज्ञा को शब्दों तक सीमित न रखकर जीवन में कैसे उतारा जाता है, यह विनोद जी के जीवन से सीखा जा सकता है। उनका हर काम समाज और संगठन के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरित था। पांडे ने पूरी पवित्रता के साथ उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।
गोरेलाल जी की यादें: गीता का श्लोक, उज्जैन की दिनचर्या, उद्योग जगत से नाता
क्षेत्र घुमंतू कार्य प्रमुख गोरेलाल जी ने अपने लंबे संस्मरणों में विनोद जी के सात्विक व्यक्तित्व, सरल व्यवहार, कार्यकर्ता-हित की चिंता और संगठन में दृढ़ता का जिक्र किया। उन्होंने गीता का श्लोक बोला, जिसमें सात्विक कर्ता की पहचान बताई गई है: “मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥” उनके अनुसार लगाव और घमंड से मुक्त रहना, धैर्य और उत्साह रखना, जीत-हार में समान भाव बनाए रखना, ये गुण विनोद जी में सहज रूप से थे।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले विनोद जी ने संघ में कई दायित्व निभाए, ऐसा गोरेलाल जी ने बताया। दायित्वों से मुक्त होने के बाद उज्जैन में रहकर भी उनकी दिनचर्या और कामकाज की निष्ठा में कमी नहीं आई। नियमित कसरत, स्नान-ध्यान, जप-तप, बाबा महाकाल के दर्शन और आरती में शामिल होना तथा अलग-अलग वर्गों और कार्यकर्ताओं से सहज संवाद बना रहा। बड़े दायित्व हटने के बाद भी उनके व्यवहार में बदलाव नहीं आया और मिलने वालों की संख्या बदलने का असर उनके मन पर नहीं पड़ा।
गोरेलाल जी के मुताबिक विनोद जी लोगों की क्षमता पहचानकर उन्हें समाज और संगठन के कामों में जोड़ने में माहिर थे। घुमंतू समाज के जो लोग आगे चलकर इंदौर में उद्योग स्थापित कर चुके थे, उन्हें उन्होंने अपनेपन से संघ के कार्य से जोड़ा। दीपावली मिलन जैसे आयोजनों में उद्योग जगत के लोगों को बुलाकर वे धीरे-धीरे उन्हें संघ की सोच से परिचित कराते गए। यह उनके रिश्ते जोड़ने की सरल और कारगर शैली थी।
महाकौशल, प्रयागराज कुंभ और आखिरी मुलाकात
महाकौशल में प्रांत प्रचारक रहते हुए विनोद जी कार्यकर्ताओं के प्रति बेहद संवेदनशील थे, ऐसा गोरेलाल जी ने कहा। किसी वरिष्ठ कार्यकर्ता का दायित्व बदलना होता तो वे उसकी भावना और सक्रियता का ख्याल रखते थे। दूसरी ओर संगठन के खिलाफ गतिविधियों के मामलों में जरूरी सख्त फैसले लेने से भी वे नहीं कतराते थे। हृदय मां जैसा कोमल था, पर संगठन के हित में निर्णय लेते समय वे दृढ़ और अनुशासित रहते थे।
प्रयागराज कुंभ में करीब एक महीने उनकी सक्रियता रही। गोरेलाल जी ने बताया कि वहां आने वाले पुराने कार्यकर्ताओं, साधु-संतों और पूर्व प्रचारकों के ठहरने-खाने की चिंता और उन्हें सक्रिय बनाए रखने में वे लगातार लगे रहे। उनकी फिक्र थी कि कोई पुराना कार्यकर्ता खुद को अनदेखा या निष्क्रिय महसूस न करे और समाज के काम में अपनी भूमिका निभाता रहे।
अंतिम भेंट का जिक्र करते हुए गोरेलाल जी ने बताया कि निधन से चार दिन पहले बड़ौदा-मेरठ प्रवास के दौरान वे विनोद जी से मिले थे। बीमार होने पर भी उनके भीतर संकल्प और काम के प्रति समर्पण साफ झलक रहा था। उज्जैन पहुंचने के करीब 12 घंटे के भीतर उन्होंने देह त्याग दी। शवयात्रा में एक पुराने कार्यकर्ता के भावुक शब्द याद करते हुए गोरेलाल जी ने कहा कि विनोद जी कई लोगों के लिए ऐसा अपना सहारा थे, जिनके सामने वे मन की बात कह सकते थे और राह पूछ सकते थे।
मां की करुणा, पिता की चिंता, गुरु की सीख
गोरेलाल जी ने कहा कि विनोद जी के व्यक्तित्व में मां की करुणा, पिता की चिंता और गुरु का मार्गदर्शन एक साथ मिलता था। उनका जीवन आज के सामाजिक कार्यकर्ताओं को सिखाता है कि कितना बोलना चाहिए, क्या बोलना चाहिए और कैसा बर्ताव करना चाहिए।
सभा में संघ और संघ प्रेरित संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और विनोद जी से आत्मीय संबंध रखने वाले कई लोग आए। सभा के आखिर में सबने मौन रखकर उन्हें नमन किया और चित्र पर पुष्प चढ़ाए।









