जबलपुर-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर को हरी झंडी: 100 करोड़ की नई कंपनी करेगी 3 लाख करोड़ का निवेश, जानें किन जिलों की बदलेगी किस्मत
मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली गवर्निंग काउंसिल कॉरिडोर कंपनी के कामकाज पर नजर रखेगी। मार्च 2028 तक ₹1 लाख करोड़ निवेश का अनुमान।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता वाली गवर्निंग काउंसिल अब जबलपुर-भोपाल-इंदौर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की नई कंपनी के कामकाज पर नजर रखेगी, वैसे ये कहा गया है कि गुरुवार 15 अक्टूबर की कैबिनेट बैठक में इस कॉरिडोर को लेकर 100 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी वाली एक SPV यानी विशेष प्रयोजन कंपनी को मंजूरी मिल गई। प्रस्तावित नाम भी रखा गया है, 'जबलपुर–इंदौर इकोनॉमिक कॉरिडोर डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड' और इसे पूरी तरह सरकारी मालिकाना हक में चलाया जाएगा।
सरकार का मूड, रोजगार और निवेश वाली कहानी
सरकार का मकसद साफ है, इस कॉरिडोर से बड़े औद्योगिक निवेश खींचना और रोजगार के नए अवसर निकलवाना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मार्च 2028 तक कॉरिडोर में 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर निवेश आने की उम्मीद है, और करीब तीन लाख लोगों के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार की संभावना बन सकती है। तीन साल वाला ये लंबा लक्ष्य भी बताया गया, जिसमें 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश और 6 लाख से अधिक रोजगार का खाका तैयार है, बस अभी ये आंकड़े अनुमान ही हैं।
DPR के बाद असल तस्वीर आएगी
शुरुआती आकलन के हिसाब से मार्च 2028 तक 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर निवेश, और करीब 1 लाख प्रत्यक्ष 2 लाख से ज्यादा अप्रत्यक्ष रोजगार का अनुमान था। लेकिन ये शुरुआती गणित है। असल तस्वीर तो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR के बनने के बाद और निवेशकों से बात-चीत के बाद ही साफ होगी, तब ही चीजें “जमीं पर” उतरेंगी।
महाकौशल समेत सात जिलों में फोकस
सरकार की सोच ये है कि कॉरिडोर से महाकौशल सहित प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में औद्योगिक गतिविधियां तेज होंगी, और रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे। योजना सात जिलों के लिए होगी: जबलपुर, नरसिंहपुर, रायसेन, भोपाल, सीहोर, देवास और इंदौर. हर इलाके में वहां के संसाधन और जरूरत के मुताबिक उद्योगों पर जोर रहेगा।
जबलपुर में इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा और एयरोस्पेस वाली सहायक इकाइयों के साथ लॉजिस्टिक्स को तरजीह दी जाएगी। नरसिंहपुर और रायसेन में खाद्य प्रसंस्करण, फूड पार्क, वेयरहाउसिंग पर काम होगा, ताकि किसानों को उपज का भंडारण और विपणन आसान हो। भोपाल में IT, टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और नॉलेज सर्विसेज जैसी गतिविधियां बढ़ाने की बात है। सीहोर और देवास में खाद्य प्रसंस्करण के अलावा लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और मैन्युफैक्चरिंग की संभावनाएं तलाशी जाएंगी। इंदौर में IT, आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाएगी, और इंदौर-देवास-पीथमपुर के मौजूदा औद्योगिक नेटवर्क से इसे जोड़ने पर भी जोर रहेगा।
पहला चरण, लगभग 10 हजार एकड़ का प्लान
पहले चरण में करीब 10 हजार एकड़ में तीन से पांच प्राथमिक औद्योगिक हब बनाए जाने हैं। वहां जमीन के साथ बिजली, पानी, सड़क, सीवरेज और डिजिटल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी। श्रमिकों के आवास, अस्पताल, स्कूल, कौशल विकास केंद्र और हरित क्षेत्र भी योजना में शामिल रहेंगे, ताकि हब सिर्फ फैक्ट्री नहीं बल्कि औद्योगिक टाउनशिप जैसे बनें। कंपनी जमीन, बुनियादी सुविधाओं और निवेश की व्यवस्था देखेगी, और सड़क निर्माण जैसी जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों की रहेगी।
समय सीमा, जगह चुनने का आधार
सरकार का टारगेट ये है कि अगले 30 दिनों के अंदर कंपनी तैयार कर दी जाए। 6 महीने में पूरे कॉरिडोर की GIS मैपिंग और लैंड बैंक तैयार हो जाएगा, और 12 महीने में प्राथमिक हब का मास्टर प्लान और DPR सामने होगा। तकनीकी अध्ययन 6 से 9 महीने के अंदर पूरा कराने की कोशिश रहेगी, उसके बाद बुनियादी सुविधाओं और जमीन आवंटन की प्रक्रिया तेज होगी। हब की सटीक जगह तय करने का आधार जमीन की उपलब्धता, पानी, बिजली, सड़क, कनेक्टिविटी और निवेशकों की डिमांड पर टिका रहेगा।






