डिंडौरी में सिस्टम की बदहाली! प्रसव पीड़ा में तड़पती गर्भवती को झोली में बैठाकर पार कराई नदी; 4 किमी दूर एंबुलेंस
डिंडौरी के कलगी टोला में सड़क और पुल नहीं होने से प्रसव पीड़ा में गर्भवती को परिजनों ने झोली में बैठाकर सिलगी नदी पार कराई। एंबुलेंस तक पहुंचने के लिए साढ़े 3 किमी पैदल चलना पड़ा। 2014 में पुल का सर्वे हुआ था, लेकिन अब तक निर्माण नहीं हुआ।

Dindori News: प्रसव पीड़ा से परेशान पत्नी, गांव तक पहुंचने का रास्ता नहीं और सामने नदी। एंबुलेंस करीब 4 किलोमीटर दूर खड़ी थी। पत्नी को दर्द से कराहते देख राजेश मरकाम और उनके परिजनों के सामने उसे अस्पताल पहुंचाने की चुनौती थी। आखिरकार परिवार ने कपड़े की झोली बनाई, उसमें गर्भवती यशोदा मरकाम को बैठाया और लकड़ी की मदद से कंधों पर उठाकर सिलगी नदी पार कराई। नदी पार करने के बाद भी परिजनों को साढ़े 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। राहत की बात रही कि शहपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में यशोदा का सुरक्षित प्रसव हुआ। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और घर लौट चुके हैं।
यह घटना डिंडौरी जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर पांकर बघर्रा ग्राम पंचायत के कलगी टोला की है। करीब 300 की आबादी वाले इस गांव में सड़क और पुल की कमी के कारण लोगों को आज भी इलाज, पढ़ाई और रोजमर्रा के कामों के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
दर्द से कराहती रही गर्भवती, झोली में बैठाकर पार कराई नदी
राजेश मरकाम के मुताबिक, 18 अक्टूबर को उनकी पत्नी यशोदा को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। आशा कार्यकर्ता ने एंबुलेंस के लिए फोन किया, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण वाहन करीब 4 किलोमीटर दूर भीटी टोला में खड़ा था। परिजनों ने कपड़े की झोली बनाई और उसके दोनों सिरों में लकड़ी फंसाकर यशोदा को कंधों पर उठा लिया। इसके बाद करीब 100 मीटर चौड़ी सिलगी नदी पार कराई। नदी पार करने के बाद परिवार रुका नहीं। यशोदा को लेकर करीब साढ़े 3 किलोमीटर पैदल चलकर एंबुलेंस तक पहुंचा। इसके बाद उन्हें शहपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां सुरक्षित प्रसव हुआ। राजेश ने बताया कि यशोदा और उनका बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और घर लौट चुके हैं।
300 की आबादी, लेकिन गांव तक नहीं पहुंचती एंबुलेंस
कलगी टोला डिंडौरी जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर है। यहां लगभग 300 लोग रहते हैं। गांव तक पक्की सड़क नहीं है और मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को सिलगी नदी पार करनी पड़ती है। सामान्य दिनों में भी यह रास्ता आसान नहीं है। बारिश के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर गांव से बाहर निकलना और मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना या किसी आपात स्थिति में एंबुलेंस तक पहुंचना बड़ी चुनौती बन जाता है।
बारिश में बच्चों की पढ़ाई भी होती है प्रभावित
गांव में प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र हैं, लेकिन मिडिल स्कूल पाकर बघर्रा में है। ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के दौरान सिलगी नदी में पानी बढ़ने पर बच्चे और शिक्षक स्कूल नहीं पहुंच पाते। इसका असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। गांव से बाहर जाने के लिए खेतों के बीच से एक कच्चा रास्ता भी है। लेकिन फसल खड़ी होने पर इस रास्ते से वाहनों का निकलना मुश्किल हो जाता है। फसल कटने के बाद ही ट्रैक्टर और बड़े वाहन वहां से गुजर पाते हैं। बारिश में कच्चा रास्ता भी भरोसेमंद विकल्प नहीं रहता।
ग्रामीणों की मांग है कि गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए स्थायी मार्ग बनाया जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई, इलाज और दूसरे जरूरी काम बारिश के कारण न रुकें।
12 साल पहले सर्वे लेकिन अब तक नहीं बना पुल
ग्रामीणों के मुताबिक, सिलगी नदी पर पुल बनाने की मांग कई साल पुरानी है। वर्ष 2014 में तत्कालीन कलेक्टर छवि भारद्वाज ने पुल निर्माण के लिए सर्वे कराया था। इससे लोगों को उम्मीद जगी थी कि जल्द ही गांव तक पहुंचने का रास्ता बन सकेगा। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि उनके स्थानांतरण के बाद काम आगे नहीं बढ़ा।
पाकर बघरा के सरपंच कौशल सिंह नेताम के मुताबिक सिलगी नदी पर पुलिया नहीं होने से भीटी टोला और कलगी टोला के लोगों को खासकर बारिश में परेशानी होती है। बच्चों का स्कूल जाना प्रभावित होता है और बीमारों व गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। शासन-प्रशासन को कई बार समस्या बताई गई, लेकिन अब तक पुलिया नहीं बनी। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसा रास्ता चाहिए जो जरूरत के समय बंद न हो।
जनप्रतिनिधियों ने भी देखी समस्या
ग्रामीण का कहना है कि वे लंबे समय से नदी पर पुल बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकारी, विधायक और सांसद गांव आकर हालात देख चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। ग्रामीण के मुताबिक चुनाव के समय सड़क और पुल बनाने के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन बाद में गांव की परेशानी दूर नहीं होती। उनका कहना है कि यदि बड़ा पुल बनाना संभव नहीं है, तो कम से कम छोटी पुलिया बनाई जाए, ताकि नदी में बाढ़ न होने पर वाहन गांव तक पहुंच सकें।
पुल पर करीब ₹3 करोड़ खर्च का अनुमान
शहपुरा विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने कहा कि वे ग्रामीणों की समस्या से अवगत हैं। उनके मुताबिक, सिलगी नदी पर पुल बनाने में करीब 3 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसी वजह से निर्माण में देरी हो रही है। विधायक ने बताया कि जंगल की ओर से वैकल्पिक सड़क बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। प्रस्तावित रास्ते में कुछ किसानों की जमीन आती है, इसलिए उनकी सहमति जरूरी है। किसानों की सहमति मिलने पर सड़क निर्माण की योजना आगे बढ़ाई जा सकती है।




