बालाघाट के नक्सल इलाकों में पहुंची स्वास्थ्य सेवाएं, 40 साल बाद घर-घर हो रहा इलाज
मध्य प्रदेश के बालाघाट में नक्सलवाद के साये से बाहर निकलकर अब 40 साल बाद विकास और स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंच रही हैं। मेडिकल टीमों ने गांवों में डेरा डाल दिया है।
नक्सल प्रभावित बालाघाट में अब घर-घर पहुंच रहे डॉक्टर
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में लंबे समय तक नक्सलवाद का गहरा असर रहा है, जिसने आम जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया। सैकड़ों गांवों के हजारों लोग स्कूल, अस्पताल और पक्की सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम रहे। बिना किसी गलती के उन आदिवासी परिवारों ने सबसे ज्यादा दर्द झेला, जिन्हें सिर्फ अपने बच्चों के लिए इलाज और रोजगार चाहिए था। लेकिन अब 40 साल के लंबे इंतजार के बाद हालात बदल रहे हैं और सरकारी स्वास्थ्य टीमें उन सुदूर गांवों तक पहुंच रही हैं, जहां पहले जाना एक बड़ी चुनौती माना जाता था।
980 घरों में चला मेडिकल सर्वे, 630 मरीज मिले
इन इलाकों में हाल ही में बच्चों में कुपोषण और बीमारियों से मौत की खबरें आई थीं, जो चिंताजनक थीं। लेकिन अब एक्शन लेते हुए स्वास्थ्य विभाग ने 20 सर्वे टीमें, 4 मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMU), 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस इन गांवों में तैनात कर दी हैं। इन टीमों ने अब तक 10 गांवों के करीब 980 घरों तक पहुंचकर स्वास्थ्य अभियान चलाया है। इस सर्वे में अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित 630 मरीजों की पहचान हुई है। इनमें से 461 मरीजों का घर पर ही सफल इलाज किया गया, जबकि 125 गंभीर मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
बच्चों को मिल रहीं जरूरी दवाएं और मेडिकल रिकॉर्ड
बच्चों की सेहत सुधारने के लिए युद्धस्तर पर काम हो रहा है। पिछले एक महीने में 169 बीमार बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 125 बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। इसके अलावा बच्चों को विटामिन-ए, डफर और जिंक की खुराक दी जा रही है। मेडिकल टीमों ने 597 बच्चों को आयरन सिरप और 521 बच्चों को अल्बेंडाजोल की गोली दी है, वहीं 63 बच्चों को मीजल्स (खसरा) का टीका लगाया गया है। सबसे अच्छी बात यह है कि अब हर व्यक्ति का मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है, ताकि भविष्य में बीमारियों का पैटर्न समझा जा सके।
100 से ज्यादा गांवों के लिए 200 करोड़ का विकास फंड
यह सारा बदलाव सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार ने इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास को तेज करने के लिए पहले चरण में 100 से ज्यादा गांवों के लिए 200 करोड़ रुपये से अधिक की बड़ी राशि मंजूर की है। जहां कभी नक्सलियों के कैंप हुआ करते थे, वहां आज जनसुविधा केंद्र और सरकारी इमारतें बन रही हैं। आज यहां सड़क का मतलब सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि एंबुलेंस और प्रशासन के पहुंचने का जरिया है।
पीएम मोदी और सीएम मोहन यादव की पहल लाई रंग
इस बदलाव की तुलना भोपाल या इंदौर जैसे विकसित शहरों से करना बेमानी होगा, क्योंकि बालाघाट अपने 40 साल के पिछड़ेपन से लड़कर आगे आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सख्त सुरक्षा रणनीति के कारण नक्सल गतिविधियों में कमी आई है। वहीं, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इन गांवों का ऐतिहासिक दौरा किया, जिससे ग्रामीणों का शासन-प्रशासन पर भरोसा लौटा है। आज उन रास्तों पर बंदूक की गूंज नहीं, बल्कि स्कूल की घंटी और डॉक्टरों की दस्तक सुनाई दे रही है।





